हिंदी साहित्य का इतिहास जितना उन रचनाकारों
का इतिहास है जिन्हें समय और साहित्येतिहास ने प्रतिष्ठित किया, उतना ही
उन कवियों का भी है जो अपनी रचनात्मक उपस्थिति के बावजूद धीरे-धीरे विस्मृति के
अंधकार में चले गए। पांडुलिपियों में बंद पड़ी रचनाएं, बिखरे
हुए संदर्भ और साहित्यिक स्मृति से ओझल होते रचनाकार हमारी साहित्यिक विरासत के
ऐसे हिस्से हैं, जिनकी पुनर्खोज केवल शोध का विषय नहीं,
बल्कि सांस्कृतिक उत्तरदायित्व भी है। कुं. शिवभूषण सिंह गौतम
‘भूषण’ द्वारा संपादित ‘भगवंतराय खींची रचित हनुमान पचासा
और उनकी अन्य उपलब्ध रचनाएं’ इसी उत्तरदायित्व-बोध से
उपजी एक महत्त्वपूर्ण कृति है। यह पुस्तक रीतिकालीन कवि-योद्धा भगवंतराय खींची के
साहित्यिक व्यक्तित्व और उनकी उपलब्ध रचनात्मक धरोहर को नए सिरे से पाठकों के
सम्मुख उपस्थित करती है। ‘हनुमान पचासा’ की पांडुलिपि की खोज का श्रेय डॉ.
कुंजीलाल पटेल को जाता है, किंतु उसकी साहित्यिक महत्ता को
पहचानकर उसे सुरक्षित करने, संपादित करने और पाठकों तक
पहुँचाने में संपादक शिवभूषण सिंह गौतम ‘भूषण’ का श्रम निश्चय ही प्रशंसनीय है।
राकेश व्यास का यह कथन इस पूरे उपक्रम की पृष्ठभूमि को सार्थक ढंग से उद्घाटित
करता है।
भगवंतराय खींची से मेरा परिचय इस पुस्तक के
हाथ में आने से बहुत पहले का है। स्मृतिशेष डॉ. बालकृष्ण पाण्डेय, डॉ.
ओउमप्रकाश अवस्थी और श्री कृष्ण कुमार त्रिवेदी के माध्यम से उनके साहित्यिक
व्यक्तित्व की कुछ झलकियाँ मिलती रही थीं। स्मृति के स्तर पर यह भी ध्यान आता है
कि डॉ. बालकृष्ण पाण्डेय ने भगवंतराय खींची पर केंद्रित किसी शोध-कार्य को प्रेरित
अथवा संपादित करवाया था। इस संदर्भ में असोथर और चित्रकूट की यात्राओं के दौरान भी
उनके साहित्य और व्यक्तित्व से संबंधित सामग्री देखने-समझने का अवसर मिला था। उनकी
कुछ फुटकल रचनाएं भी यत्र-तत्र पढ़ने को मिली थीं। ऐसे में शिवभूषण सिंह गौतम
‘भूषण’ द्वारा संपादित यह पुस्तक हाथ में आना केवल एक नई पुस्तक से परिचय होना
नहीं था; यह पुरानी साहित्यिक जिज्ञासाओं के सामने एक
अपेक्षित उत्तर के उपस्थित हो जाने जैसा अनुभव था। बिखरे हुए संकेतों को एक जगह
संकलित देखकर उस कवि के प्रति जिज्ञासा भी संतुष्ट होती है और यह प्रश्न भी अधिक
तीव्रता से सामने आता है कि हिंदी साहित्य के इतिहास में ऐसे कितने ही रचनाकार अब
भी हमारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।
संपादक ने संपादकीय में अत्यंत सारगर्भित
ढंग से लिखा है— “भगवंतराय स्वयं जितने अच्छे कवि थे, उतने
ही अच्छे कवियों और विद्वानों के आश्रयदाता भी थे।” यह कथन
भगवंतराय के व्यक्तित्व को उसकी व्यापकता में देखने की दृष्टि देता है। मध्यकालीन
साहित्यिक संस्कृति में आश्रयदाता की भूमिका केवल आर्थिक संरक्षण तक सीमित नहीं थी; वह
साहित्यिक वातावरण के निर्माण और रचनात्मक परंपराओं के संरक्षण से भी जुड़ी थी।
इसलिए भगवंतराय का अध्ययन एक कवि के अध्ययन के साथ-साथ उस साहित्यिक संस्कृति की
पड़ताल भी है जिसमें कविता का सृजन और संरक्षण संभव हुआ।
‘हनुमान पचासा’ इस पुस्तक का केंद्रीय आकर्षण
है। हनुमान भारतीय लोकमानस में शक्ति, साहस, निष्ठा, भक्ति और संकटमोचन के प्रतीक हैं। इसलिए
हनुमान को केंद्र में रखकर रचा गया काव्य स्वाभाविक रूप से भक्ति के साथ वीरत्व और
ओज की भूमि पर भी प्रतिष्ठित होता है। भगवंतराय के कवित्तों में हनुमान की कृपा और
उनके क्रोध—दोनों की विराटता दिखाई देती है—
‘कृपा के कटाच्छ ही तैं काम तर काम कोट
वड़त विभूत वर विविध विधान के।
क्रुद्ध के कटाच्छ ही तैं दुस्ट जर छार होत
लंक से अतंक भए दुरग दिसान के।’
इन पंक्तियों में हनुमान की कृपा को
मनोकामना-पूर्ति की शक्ति और उनके क्रोध को दुष्टों के विनाश की प्रचंड ऊर्जा के
रूप में देखा गया है। ‘लंक से अतंक’ जैसी अभिव्यक्तियाँ कवि के भीतर विद्यमान
वीर-भाव और काव्यात्मक कल्पना को एक साथ सामने लाती हैं। यहाँ भक्ति निष्क्रिय
आत्मसमर्पण नहीं है; वह शक्ति में परिणत होती है। यही ‘हनुमान पचासा’ के
काव्य-संसार की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है।
प्राचीन काव्य को वर्तमान पाठक तक पहुँचाने
की सबसे बड़ी चुनौती भाषा और संदर्भ की दूरी है। समय बदलने के साथ शब्दों के
अर्थ-संदर्भ, मुहावरे और सांस्कृतिक संकेत भी कई बार अपरिचित हो जाते हैं।
यदि ऐसी रचनाओं को बिना किसी संपादकीय सहयोग के प्रकाशित कर दिया जाए, तो उनका पाठ सीमित वर्ग तक ही रह सकता है। इस दृष्टि से इस पुस्तक का
संपादकीय विन्यास विशेष रूप से उल्लेखनीय है। भगवंतराय खींची के कवित्तों को भावार्थ,
शब्दार्थ और टिप्पणी के साथ प्रस्तुत किया
गया है। इससे मूल काव्य की गरिमा और भाषिक विशिष्टता सुरक्षित रहते हुए उसके अर्थ
तक पहुँचने का मार्ग भी सुगम होता है। संपादक ने मूल पाठ और आधुनिक पाठक के बीच एक
उपयोगी सेतु निर्मित किया है। यहाँ संपादन का महत्त्व केवल पाठ को शुद्ध या
व्यवस्थित करने में नहीं, बल्कि उसकी पठनीयता और
अर्थगम्यता बढ़ाने में भी है। इस कारण पुस्तक शोधार्थी के लिए संदर्भ-सामग्री
और सामान्य पाठक के लिए साहित्यिक पाठ—दोनों भूमिकाएं निभाने में समर्थ होती है।
पुस्तक का महत्त्व ‘हनुमान पचासा’ तक सीमित
नहीं है। इसके परिशिष्ट-क में सदानंद मिश्र द्वारा भगवंतराय खींची पर
केंद्रित विविध रचनाएं संकलित की गई हैं। इनमें कवित्त, दोहे,
मत्तगयंद, त्रोटक, भुजंग
प्रयात, कुंडलियाँ, गीतिका, लीलावती, चंद्रकला, त्रिभंगी,
ससिवदना, संखनारी, रूपघना
तथा सर्वकल्याण दंडक जैसे विविध छंद सम्मिलित हैं। यह छंद-विविधता अपने आप में
महत्त्वपूर्ण है। इससे न केवल भगवंतराय से संबद्ध साहित्यिक परिवेश का संकेत मिलता
है, बल्कि उस समय की छंद-संपदा और काव्याभिरुचि के अध्ययन के
लिए भी सामग्री उपलब्ध होती है। इसी प्रकार परिशिष्ट-ख में विविध प्राचीन
संदर्भों से उद्धृत सामग्री को स्थान दिया गया है। ये संदर्भ पुस्तक को केवल एक
रचना के संपादित पाठ से ऊपर उठाकर एक उपयोगी साहित्यिक-संदर्भग्रंथ का स्वर प्रदान
करते हैं। विशेषतः किसी विस्मृत कवि के पुनर्मूल्यांकन में ऐसे संदर्भों की भूमिका
महत्त्वपूर्ण होती है, क्योंकि वे कवि की साहित्यिक उपस्थिति
के बाहरी प्रमाण और अंतर्पाठीय संकेत उपलब्ध कराते हैं।
भगवंतराय खींची की रचनाओं का प्रकाशन
रीतिकाल की हमारी प्रचलित साहित्यिक धारणाओं को भी थोड़ा विस्तृत करता है। रीतिकाल
का उल्लेख होते ही प्रायः कुछ प्रतिष्ठित कवियों और शृंगार-केंद्रित काव्यधारा की
स्मृति सामने आती है। किंतु साहित्यिक परंपरा इससे कहीं अधिक व्यापक और बहुरंगी
रही है। भगवंतराय जैसे कवि उस व्यापकता की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं।
उनके व्यक्तित्व में कवि और योद्धा का
समन्वय तथा साहित्य के प्रति आश्रयदाता की भूमिका एक अलग तरह का साहित्यिक चरित्र
निर्मित करती है। ‘हनुमान पचासा’ में भक्ति और वीरत्व का सामंजस्य भी इस व्यापक
रीतिकालीन साहित्यिक परिदृश्य को समझने में सहायक हो सकता है। इसलिए यह पुस्तक
केवल एक विस्मृत कवि की रचनाओं का संकलन नहीं है; इसमें रीतिकाल के
पुनर्पाठ की संभावनाएं भी निहित हैं।
कृति की महत्ता स्वीकार करते हुए आलोचनात्मक
दृष्टि से कुछ अपेक्षाएँ स्वाभाविक हैं। भगवंतराय खींची जैसे विस्मृत कवि के
संदर्भ में उनके जीवन-काल, ऐतिहासिक परिवेश, समकालीन
साहित्यिक संसार, आश्रयदाता-परंपरा तथा उपलब्ध पांडुलिपियों
की पाठ-परंपरा पर यदि और विस्तार से चर्चा होती, तो पुस्तक
का शोधपरक महत्त्व और बढ़ सकता था। इसी प्रकार पाठांतर, पांडुलिपि-परंपरा
और रचनाओं की प्रामाणिकता से जुड़े प्रश्नों पर विस्तार भविष्य के शोध के लिए
उपयोगी आधार निर्मित कर सकता है। लेकिन इन अपेक्षाओं को पुस्तक की सीमा के रूप में
देखने के बजाय इसे आगे होने वाले शोध के लिए खुला हुआ द्वार मानना अधिक उचित होगा।
इस पुस्तक ने जिस सामग्री को सामने रखा है, वह स्वयं अनेक नए
अनुसंधान-प्रश्नों को जन्म देती है।
किसी भूले हुए कवि को पुनः सामने लाना केवल
अतीत की ओर लौटना नहीं है। यह वर्तमान के साहित्य-बोध को अधिक व्यापक और समावेशी
बनाना भी है। ‘भगवंतराय खींची रचित हनुमान पचासा और उनकी अन्य उपलब्ध रचनाएं’ इसी अर्थ में
महत्त्वपूर्ण है। यह पुस्तक बताती है कि साहित्य का इतिहास अभी पूरा नहीं हुआ है; उसकी
अनेक पंक्तियाँ पांडुलिपियों, पुराने संदर्भों और विस्मृत
स्मृतियों में अब भी लिखी हुई हैं। शिवभूषण सिंह गौतम ‘भूषण’ का यह संपादकीय
प्रयास इसलिए साधुवाद का अधिकारी है कि उन्होंने उपलब्ध सामग्री को केवल सुरक्षित
नहीं किया, बल्कि उसे वर्तमान पाठक के लिए अर्थवान बनाया है।
भावार्थ, शब्दार्थ और टिप्पणियों के माध्यम से उन्होंने पाठ
की दूरी कम की है और परिशिष्टों के माध्यम से उसके साहित्यिक संदर्भ का विस्तार
किया है। अंततः यह कृति एक विस्मृत कवि की वापसी का दस्तावेज ही नहीं,
साहित्यिक स्मृति के पुनरुद्धार का उपक्रम भी है। ‘हनुमान पचासा’ के माध्यम से भगवंतराय खींची की काव्य-प्रतिभा सामने आती है
और पुस्तक के अन्य अंश उनके साहित्यिक व्यक्तित्व की परिधि को और व्यापक करते हैं।
हिंदी साहित्य के इतिहास में उपेक्षित अथवा विस्मृत रचनाकारों की खोज और उनके
साहित्य के प्रामाणिक संपादन की जो आवश्यकता आज पहले से अधिक अनुभव की जा रही है,
उस दिशा में यह पुस्तक एक सार्थक और स्वागतयोग्य कदम है। किसी
साहित्यिक विरासत का सबसे बड़ा उद्धार यही है कि वह केवल संग्रहालय की वस्तु बनकर
न रह जाए, बल्कि फिर से पढ़ी जाए, समझी
जाए और साहित्यिक संवाद का हिस्सा बने। भगवंतराय खींची की यह वापसी इसी अर्थ में
आश्वस्त करती है कि विस्मृति अंतिम सत्य नहीं होती।

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