मैं या कैरियर

 जब मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ, तो लगता है जैसे जिंदगी ने मुझे कई बार कठिन मोड़ों पर लाकर खड़ा किया है। मगर शायद सबसे बड़ी कसौटी मेरी शादी के बाद आई। मैं रीना हूँ- एक इंजीनियर, एक बेटी, एक पत्नी। और सबसे बढ़कर एक इंसान, जिसे अपनी पहचान की लड़ाई खुद लड़नी पड़ी।

मैं और राज एक ही क्लास में पढ़ते थे। पढ़ाई में अच्छे, आत्मविश्वासी और महत्वाकांक्षी। प्यार कब हुआ, कैसे हुआ... ये तो याद नहीं, मगर इतना याद है कि राज की आँखों में हमेशा मेरे लिए एक अपनापन, एक भरोसा दिखता था। शायद इसी भरोसे पर हमने अपने भविष्य की बुनियाद रख दी। हम दोनों का कैंपस सिलेक्शन भी हो गया। मैंने टॉप किया, और मुझे एक बड़ा पैकेज भी मिला। उस वक्त राज ने कुछ नहीं कहा, मगर अब समझ आता है कि उसकी चुप्पी में जलन की एक धीमी आंच थी।

शादी हुई सादगी से, परिवार की रजामंदी से। लेकिन कुछ ही महीनों में राज बदलने लगा। वह बातों-बातों में ताना देने लगा, ‘क्या जरूरत है नौकरी की? हमारे घर की औरतें तो घर संभालती हैं। मैंने तो तुम्हें शौक पूरा करने दिया, अब बस करो।’

शौक?’ -ये शब्द मेरे कानों में हथौड़े-सा बजा।

राज, मैंने इंजीनियरिंग किसी शौक से नहीं की। मेरे मम्मी-पापा ने मेरी पढ़ाई के लिए न जाने कितनी कुर्बानियां दीं। मेरी पढ़ाई, मेरी नौकरी... ये मेरा कैरियर है, मेरी पहचान है।’

लेकिन राज मानने को तैयार नहीं था।

फैसला कर लो।’ -उसने ठंडे स्वर में कहा, ‘मैं या कैरियर। एक महीने का समय है तुम्हारे पास।’

उस रात मैं ठीक से सो नहीं पाई। आँखों में उसके दिए अल्टीमेटम की किरचें चुभती रहीं। हम साथ-साथ चार साल तक पढ़े। एक-दूसरे का साथ देने का वादा किया। ...और आज वह मुझे मेरे वजूद से दूर करने पर तुला है?

मैंने बात करने की कई कोशिशें कीं, लेकिन उसने या तो टाल दिया या चुप्पी ओढ़ ली। घर में सास-ससुर भी हमारी खामोशी को महसूस कर रहे थे। सारा घर किसी अनकहे बोझ के नीचे दब गया था। मैं ऑफिस जाती थी, वहाँ भी मन नहीं लगता। मेरी दोस्त मिताली ने जब पूछ ही लिया, तो मैं खुद को रोक नहीं पाई। सब बता दिया।

उसने कहा, ‘राज से खुलकर बात करो, ये मत सोचो क्या होगा। सच से भागना हल नहीं है।’

शायद वही बात मेरे मन में गूंजती रही जब मैं घर लौटी। उस दिन मम्मी जी ने चाय बनाई, पिन्नियां निकालीं। वो पिन्नियां जो राज और मुझे पसंद थीं। पापा यानी रमनजीत जी चुपचाप बैठे थे। आखिर उन्होंने ही कहा, ‘पुत्तर, बात करनी है तुम दोनों से।’

मैं डर गई थी। कहीं वो भी राज का ही साथ न देने लगें। लेकिन उनके शब्दों ने मेरे भीतर का डर तोड़ दिया।

क्या करूं का क्या मतलब? तेरा घर है ये, तू इधर ही रहेगी। और राज, खोते दा पुत्तर... तू इतना पढ़-लिखकर भी ऐसी छोटी सोच लेकर आया है?’ -उनके शब्द सीधे दिल में उतर गए। फिर मेरी ओर मुड़कर बोले, ‘और तेरा क्या विचार है पुत्तर?’

मैं रोते-रोते बोल पड़ी, ‘पापा जी, अगर जरूरत पड़ी तो मैं प्यार को चुनूंगी, क्योंकि आप जैसे लोग दोबारा नहीं मिलते।’

मेरे इतना कहने पर राज एकदम खामोश हो गया। शायद उसे पहली बार एहसास हुआ कि उसका ईगो उसकी जिंदगी के सबसे कीमती रिश्ते को तोड़ने जा रहा था। उसने पापा से माफी माँगी, मुझे देखा, और कहा, ‘सॉरी रीना। अब कभी नहीं कहूँगा- मैं या कैरियर।’

मैंने भी उसका हाथ थाम लिया। उस दिन पहली बार लगा कि शादी का मतलब सिर्फ प्यार नहीं होता। समझदारी, विश्वास और साथ निभाने की नीयत भी जरूरी होती है।

मम्मी जी किचन से चाय और पिन्नियां लेकर आ गईं। घर का माहौल फिर से हल्का हो गया। सबके चेहरों पर मुस्कान थी, और मेरे भीतर एक अजीब सी राहत। शायद यही होता है। जब किसी की सोच बदलती है, तब ही रिश्ते सच में मजबूत बनते हैं।

अब जब ऑफिस से लौटकर राज मेरे लिए चाय बनाता है, तो मुस्कुरा कर कहता है, ‘मेरी इंजीनियर साहिबा के लिए।’ और मैं सोचती हूँ कि काश हर लड़की को ऐसा समर्थन, ऐसा समझदार परिवार और ऐसा ही समय मिल सके, जिससे वो अपने आत्मसम्मान को बचा सके।

  .2.

 कभी-कभी हम वही गलती कर बैठते हैं, जो हमें दूसरों में सबसे अधिक नजर आती है। मैं राज हूँ। एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर। एक बेटा, एक पति, और... एक समय का बहुत अहंकारी प्रेमी। मैं और रीना कॉलेज में मिले थे। उसे देखकर पहली बार लगा था कि कोई किसी भीड़ में भी अपनी रोशनी से अलग दिख सकता है। वो तेज थी, आत्मनिर्भर, और इतनी स्पष्टवादी कि कई बार डर भी लगता था कि कहीं ये मुझसे ज्यादा आगे न निकल जाए। और ऐसा हुआ भी।

कॉलेज खत्म होते-होते मैं उससे प्यार करने लगा था। गहरा, सच्चा, लेकिन कहीं भीतर एक डर छुपा था। रीना ने मुझसे कभी पीछे मुड़कर कुछ नहीं मांगा। वो अपनी शर्तों पर जीती थी, और यही बात मुझे आकर्षित भी करती थी और परेशान भी। जब कैंपस प्लेसमेंट हुआ, तो मैं एक मिड-लेवल कंपनी में चुना गया, और रीना को मिला एक मल्टीनेशनल कंपनी का ऑफर। मुझसे दोगुनी सैलरी, बड़ा पद और बेहतरीन भविष्य। मैं खुश था... शायद थोड़ी देर के लिए। फिर हमने शादी कर ली। शादी के बाद चीजें बदलने लगीं। मैं घर लौटता, वह ऑफिस से मीटिंग्स करके आती। उसके फोन कॉल्स, उसका काम, उसके सपने... सब मुझे धीरे-धीरे छोटा करने लगे। पर शायद वो मेरे भीतर का डर था, जो मेरे प्यार पर हावी होने लगा था। शायद इसी डर की परिणतिस्वरूप मैंने धीरे-धीरे उसे ताने देने शुरू कर दिए, ‘घर भी संभालो कभी।... इतनी क्या जरूरत है भाग-दौड़ की?’ और फिर एक दिन गुस्से में कह बैठा, ‘मैं या कैरियर... एक महीना है तुम्हारे पास सोचने के लिए।’ -ये कहते वक्त मैं खुद कांप गया था। पर मेरे अहम ने मुझे रोके रखा।

रीना चुप रही। न लड़ाई की, न शिकायत। बस उसकी आँखों में एक खामोश तूफान दिखा, जो मुझे डरा गया। उस एक महीने में मैं खुद से लड़ता रहा। मैं उसे चाहता था, लेकिन चाहता था कि वो वैसी हो जाए जैसी मेरी माँ या चाची थीं- घरेलू, समर्पित, शांत। मगर रीना वो नहीं थी। वो अपनी शर्तों पर जीने वाली लड़की थी।

एक दिन जब पापा ने हमें साथ बिठाकर बात की, तो उन्होंने कुछ नहीं पूछा, बस कहा, ‘राज, तू इतना पढ़-लिखकर भी ऐसी सोच लेकर आया है?’ और फिर रीना की ओर देखकर बोले, ‘ये घर तेरा है पुत्तर, तू यहीं रहेगी।’

मेरे भीतर कुछ टूटने-सा लगा। एक लड़की, जिसे मैंने सबसे ज्यादा चाहा। आज मैं ही उसे उसके सपनों से काट रहा था। क्या मैं सिर्फ इसलिए उससे प्यार करता था कि वो मेरे से पीछे रहे? मैं फूट-फूटकर रोना चाहता था, लेकिन सिर्फ इतना कह पाया, ‘सॉरी रीना, अब कभी नहीं कहूँगा- मैं या कैरियर।’ उसने कुछ नहीं कहा, बस मेरा हाथ थाम लिया। उस स्पर्श में सारे शब्द समा गए।

अब जब वो ऑफिस जाती है, और लौटकर मुस्कुराते हुए मुझे दिन भर की बातें सुनाती है, तो लगता है जैसे मैं दोबारा उसके प्यार में पड़ रहा हूँ। इस बार एक औरत से नहीं, उसके पूरे अस्तित्व से।

कभी-कभी लगता है, अगर उस दिन मैंने माफी नहीं माँगी होती, तो शायद जिंदगी भर खुद से नजर नहीं मिला पाता। अब जब मैं दोस्तों से कहता हूँ, ‘अगर तुम्हारी पत्नी सफल हो रही है, तो समझो तुम भी सफल हो रहे हो।’ तो दोस्त मुस्कुराते हैं। और मैं भीतर ही भीतर खुद को धन्यवाद देता हूँ कि मैंने वक्त रहते सीख लिया- प्यार तब जीतता है, जब अहंकार हार मान लेता है।

 

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