मैंने हमेशा सोचा था कि मैं एक अच्छा बेटा हूँ। शायद इसलिए नहीं कि मैंने अपने
पिता के लिए बहुत कुछ किया, बल्कि इसलिए कि मैंने
कभी यह सवाल खुद से पूछा ही नहीं कि मैंने उनके लिए किया क्या है। उनकी मृत्यु की रात,
करीब एक बजे, जब नौकर ने आकर कहा, ‘साहब, बाबूजी नहीं रहे।’
तो मेरे भीतर कुछ टूटा नहीं। यह स्वीकार करना आसान नहीं है, पर सच यही है- मैं स्तब्ध था, दुखी नहीं। मनोविज्ञान इसे ‘इमोशनल नम्बिंग’ यानी भावनात्मक
सुन्नता कहता है। जब हम किसी लंबे, थकाऊ, भावनात्मक दबाव के बाद संवेदनाओं को महसूस करना
लगभग बंद कर देते हैं।
पिछले चार महीनों से बाबूजी बिस्तर पर थे। उनका निर्भर हो जाना... उनका बार-बार
बुलाना... उनकी असहायता... यह सब मुझे भीतर ही भीतर थका चुका था। और शायद इसी थकान
ने मेरे भीतर एक छिपी हुई रिलीफ रिस्पांस की भावना पैदा कर दी थी- जिसे मैं स्वीकार
नहीं करना चाहता था, लेकिन वह थी।
हमारा घर बड़ा है। लोगों से भरा हुआ। मैं, मेरा छोटा भाई निखिल, हमारी पत्नियाँ, बच्चे, नौकर। पर इस भीड़ में बाबूजी
अकेले थे। यह अकेलापन शारीरिक नहीं, भावनात्मक था। हमने उनकी देखभाल की, व्यवस्था के स्तर पर। एक अटेंडेंट रखा, दवाइयाँ दिलाईं, खर्च उठाया। पर जो नहीं दिया, वह था- समय,
संवाद और उपस्थिति। अब पीछे मुड़कर देखता हूँ तो
समझ आता है कि हमने अपनी जिम्मेदारियों को आउटसोर्स कर दिया था, और अपने अपराधबोध को तर्कों में बदल दिया था।
सुबह जब रिश्तेदार इकट्ठा हुए और अंतिम संस्कार की तैयारी होने लगी, तो एक बुजुर्ग ने पूछा, ‘मुँह में सोना डाला?’
यह एक साधारण-सी परंपरा थी, लेकिन उस क्षण वह
मेरे लिए एक मनोवैज्ञानिक परीक्षण बन गई।
मैं अंदर गया और संध्या से कहा, ‘जरा सा सोना दे दो।’
उसने मना कर दिया। उसके तर्क थे- व्यावहारिक, पुराने गिले-शिकवों से भरे हुए, और कहीं-न-कहीं सही भी।
मैंने उसे मनाने की कोशिश की, पर सच कहूँ तो मैं
खुद भी पूरी तरह आश्वस्त नहीं था कि मैं यह क्यों करना चाहता हूँ। क्या यह पिता के
प्रति प्रेम था? या समाज के सामने
अपनी छवि बचाने की कोशिश? यहाँ मनोविज्ञान का
एक और सिद्धांत सामने आता है- कॉग्निटिव डिसोनेंस यानी मनोवैज्ञानिक असहजता या मानसिक
द्वंद्व। मैं खुद को एक ‘कर्तव्यनिष्ठ बेटा’ मानता था, लेकिन मेरे कर्म उस छवि से मेल नहीं खाते थे। इस असंगति को दूर
करने के लिए, मैं एक प्रतीकात्मक कार्य-
‘सोना मुँह में डालना’ करके खुद को संतुष्ट करना चाहता था।
जब संध्या ने मना किया, तो एक पल के लिए मुझे
गुस्सा आया। पर अगले ही क्षण, मैंने खुद से सवाल
किया- क्या मैं अपनी अंगूठी उतारकर यह कर सकता हूँ? मेरी उंगलियों में महंगी अंगूठियाँ थीं। मैंने एक को उतारा...
देखा, और फिर वापस पहन लिया। यह
वही क्षण था जहाँ मेरी वास्तविकता मेरे सामने निर्वस्त्र खड़ी थी। मैंने समझ लिया- मैं
वह त्याग करने को तैयार नहीं था, जिसकी अपेक्षा मैं
दूसरों से कर रहा था।
बाहर से आवाजें आ रही थीं, ‘देर हो रही है।’
मैं पिता के पास गया। उनका चेहरा शांत था। इतना शांत कि मुझे असहजता हुई। जीवन
भर मैंने उन्हें सक्रिय, निर्णय लेने वाला,
सब कुछ नियंत्रित करने वाला व्यक्ति देखा था। और
आज, वे पूरी तरह निर्जीव थे। मैंने
सोचा- क्या मैंने कभी उन्हें सच में देखा था? या सिर्फ उनकी भूमिका को देखा था। एक कमाने वाले, एक संरक्षक, एक जिम्मेदारी निभाने वाले व्यक्ति के रूप में?
मैं झुका। मेरे हाथ कांप नहीं रहे थे। यह मुझे आज भी डराता है। मैंने उनके होंठ
खोले, और भीतर कुछ रख दिया। वह सोना
नहीं था। वह एक छोटा-सा धातु का टुकड़ा था, शायद पास पड़ी किसी चीज से तोड़ा हुआ।
किसी ने नहीं देखा। और मैंने भी किसी को देखने नहीं दिया।
उस क्षण मैंने एक और सच महसूस किया कि मैंने यह काम बाबूजी के लिए नहीं किया था।
मैंने यह अपने लिए किया था। ताकि मैं अपने भीतर यह कह सकूं, ‘मैंने रस्म निभा दी।’ यह सेल्फ-जस्टिफिकेशन था।
अपने अपराधबोध को कम करने का एक तरीका।
आज, जब उस घटना को याद करता हूँ,
तो सबसे ज्यादा जो भाव उभरता है, वह है- गिल्ट या अपराध बोध का। पर यह साधारण अपराधबोध
नहीं है। यह डिलेज्ड रीअलाइजेशन है- देर से समझ में आया हुआ सच।
मैंने अपने पिता को खोने से पहले ही खो दिया था। और जिस दिन वे सच में गए,
उस दिन मैंने सिर्फ एक शरीर को विदा किया। रिश्ता
तो बहुत पहले ही मर चुका था। अब मैं अक्सर सोचता हूँ कि क्या वह सोना सच में जरूरी
था? या वह प्रेम, जो मैंने कभी व्यक्त नहीं किया- वह ज्यादा जरूरी
था? शायद संस्कार वस्तुओं से नहीं,
भावनाओं से पूरे होते हैं। और मैंने... दोनों ही
अधूरे छोड़ दिए। यह सिर्फ मेरी कहानी नहीं है,
यह उस मनोवृत्ति की कहानी है, जहाँ हम कर्तव्यों
को निभाते हैं। पर रिश्तों को जीना भूल जाते हैं। और अंत में एक छोटा-सा धातु का टुकड़ा...
हमारे पूरे जीवन का सबसे बड़ा सच उजागर कर देता है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें