समकालीन हिंदी कविता अपने समय की धड़कनों को सुनने के साथ-साथ उसकी विसंगतियों,
अंतर्विरोधों और बदलते जीवन-मूल्यों को पहचानने का कार्य भी करती है। डॉ. विनोद कुमार का कविता-संग्रह ‘रण जारी है’ इसी सजग और संवेदनशील काव्य-दृष्टि की सार्थक परिणति है। प्राध्यापक,
कवि,
समीक्षक और अनुवादक के रूप में सक्रिय डॉ. विनोद कुमार का व्यक्तित्व भारतीय सांस्कृतिक चेतना, मानवीय संवेदना और सामाजिक सरोकारों से गहरे जुड़ा हुआ है। उनकी कविता जीवन को उसके विविध रूपों में देखने के साथ-साथ उन प्रश्नों से भी मुठभेड़ करती है, जो हमारे वर्तमान को भीतर से विचलित कर रहे हैं। 175
पृष्ठों में संकलित 51 कविताओं का यह संग्रह वस्तुतः समकालीन समय की एक संवेदनशील काव्य-दस्तावेजी अभिव्यक्ति है। संग्रह का शीर्षक ‘रण जारी है’ ही इसकी केंद्रीय चेतना को उद्घाटित करता है। यहाँ ‘रण’ किसी बाहरी युद्ध का पर्याय मात्र नहीं, बल्कि सत्य और असत्य, मूल्य और मूल्यहीनता,
मनुष्यता और बाजारवाद,
आत्मसम्मान और आत्मविस्मृति तथा प्रतिरोध और समर्पण के बीच चल रहे निरंतर संघर्ष का प्रतीक है।
संग्रह के ‘पुरोवाक…’ में कवि स्वयं अपने समय की एक महत्त्वपूर्ण चिंता को रेखांकित करते हुए स्वीकार करता है कि “शिक्षा-साहित्य, आचार-व्यवहार,
बाजारवादी प्रवृत्तियों के प्रभाव में अपने मूल उद्देश्य से भटकते दिखाई देते हैं।” यही कथन पूरे संग्रह की वैचारिक पृष्ठभूमि को समझने की एक महत्त्वपूर्ण कुंजी है। कवि अपने आसपास के जीवन को केवल देखने वाला तटस्थ दर्शक नहीं है; वह विसंगतियों से बेचैन होता है और कविता के माध्यम से उनसे संवाद करता है। ‘अन्धों का शासन’ में मिथकीय संदर्भों के माध्यम से समकालीन सत्ता-संरचना और नैतिक विडंबनाओं को उकेरा गया है—
महाभारत के पात्र यहाँ अपने पारंपरिक अर्थों से आगे बढ़कर वर्तमान की सत्ता-व्यवस्था और स्वार्थपूर्ण गठबंधनों के प्रतीक बन जाते हैं। धृतराष्ट्र की दृष्टिहीनता केवल शारीरिक नहीं रह जाती, बल्कि नैतिक विवेक के अभाव का संकेत बनती है। कवि मिथक को वर्तमान के संदर्भ में पुनर्पाठित करता है और इस प्रकार अतीत के माध्यम से वर्तमान की विसंगतियों को पहचानने की दृष्टि प्रदान करता है। इसी क्रम में ‘मातदीन’ इतिहास की स्मृति और आत्मसम्मान के प्रश्न को सामने लाती है—
यह प्रश्न एक व्यक्ति की स्मृति से आगे बढ़कर सामूहिक आत्मसम्मान के क्षरण का प्रश्न बन जाता है। कवि इतिहास को अतीत की बंद किताब की तरह नहीं देखता, बल्कि वर्तमान की चेतना को जाग्रत करने वाली जीवंत स्मृति के रूप में ग्रहण करता है। ‘काँटों में मुस्कुराता गुलाब’ में कवि मानवीय अहंकार की अतिशयता को एक अत्यंत संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली पंक्ति में व्यक्त करता है—
‘आसमान’ का बिम्ब यहाँ अहंकार की असीमता को रेखांकित करता है। कविता की विशेषता उसकी संक्षिप्तता में निहित है। कुछ ही शब्दों में कवि मनुष्य की उस मानसिकता को पकड़ लेता है जिसमें ‘मैं’ का विस्तार इतना अधिक हो जाता है कि दूसरों के अस्तित्व के लिए स्थान ही नहीं बचता। डॉ. विनोद कुमार की काव्य-दृष्टि में कविता केवल विसंगतियों की पहचान करने का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों के पुनर्निर्माण की रचनात्मक प्रक्रिया भी है। ‘जीवन का सार’ में कवि का कथन है—
यह पंक्ति कवि की साहित्य संबंधी आस्था को व्यक्त करती है। उनके लिए कवि केवल शब्दों का शिल्पी नहीं, बल्कि जीवन-मूल्यों का सर्जक भी है। इसी विचार का व्यापक रूप ‘वीणा-वाणी’ में दिखाई देता है—
कला, साहित्य और अध्यात्म को एक साथ रखकर कवि जीवन की उस समग्र दृष्टि की स्थापना करता है जिसमें बाहरी उपलब्धियों की अपेक्षा आंतरिक परिष्कार अधिक महत्त्वपूर्ण हो जाता है। समकालीन जीवन में धन और सफलता के बदलते अर्थों पर कवि की दृष्टि ‘एक था राकेश झुनझुनवाला’ में विशेष रूप से दिखाई देती है—
यहाँ ‘अंक’ आधुनिक आर्थिक सफलता और ‘जी लिए गए पल’ मानवीय जीवन की वास्तविक संपदा के प्रतीक बन जाते हैं। कविता अर्थ-संचय के विरुद्ध कोई सरल निषेध प्रस्तुत करने के बजाय पाठक को यह सोचने के लिए प्रेरित करती है कि जीवन की सार्थकता को किस पैमाने से मापा जाना चाहिए। ‘बरगद’ संग्रह की स्मृति-प्रधान कविताओं में विशेष उल्लेखनीय है—
भारतीय सांस्कृतिक चेतना में बरगद स्थायित्व,
परंपरा और आश्रय का प्रतीक है। कवि का यह कहना कि बरगद अब ‘बाहर’ कम और ‘भीतर’ अधिक उगता है, स्मृति के आंतरिक संसार को अत्यंत सुंदर बिम्ब प्रदान करता है। बाहरी वृक्ष का भीतर रूपांतरित हो जाना व्यक्ति और उसकी सांस्कृतिक स्मृतियों के बीच के संबंध को रेखांकित करता है। इसी आत्मान्वेषी चेतना का विस्तार ‘स्वयं होने की प्रतिध्वनि’ में मिलता है—
‘दीपक की लौ’ और ‘पूरी रात का अंधकार’ के बीच निर्मित विरोधाभास कविता को दार्शनिक अर्थवत्ता प्रदान करता है। ‘खुद होना’ यहाँ केवल आत्मपरिचय नहीं, बल्कि अपनी अस्मिता को पहचानने और उसे बचाए रखने की चुनौती बन जाता है।
‘मौन भी चीखता है’ में सत्ता और सत्य के संबंध को अत्यंत प्रभावी प्रतीकात्मकता के साथ व्यक्त किया गया है—
‘सन्नाटा’ और ‘भीड़’ के विरोध के माध्यम से कवि सत्ता की क्षणभंगुरता और सत्य की सामूहिक चेतना की ओर संकेत करता है। मौन यहाँ निष्क्रियता नहीं, बल्कि भीतर संचित प्रतिरोध की संभावित ऊर्जा है। लोकतांत्रिक चेतना की इसी पृष्ठभूमि में ‘गणतंत्र सफल हो गया’ की पंक्तियाँ विचारणीय हैं—
यहाँ गणतंत्र को केवल चुनावी प्रक्रिया तक सीमित न रखकर नागरिक चेतना और लोकतांत्रिक संस्कार से जोड़ा गया है। कविता पाठक के समक्ष एक आत्मपरीक्षण का प्रश्न रखती है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक सफलता संस्थागत प्रक्रियाओं के साथ-साथ नागरिक मनोवृत्ति में भी निहित है।
संग्रह में कवि का प्राध्यापक व्यक्तित्व ‘डिग्रियों के शोरूम’ में विशेष रूप से मुखर होता है। शोध की बदलती प्रवृत्तियों और अकादमिक क्षेत्र में मौलिकता के संकट पर कवि तीखा व्यंग्य करता है—
‘शॉर्टकट’ और ‘कॉपी-पेस्ट’ जैसे प्रचलित तकनीकी शब्दों को ‘दलदल’ और ‘कूड़ा-कर्कट’ जैसे बिम्बों के साथ जोड़ना कविता को समकालीन संदर्भ देता है। यह व्यंग्य केवल शोधार्थी के आचरण पर नहीं, बल्कि उस समूची अकादमिक संस्कृति पर केंद्रित है जहाँ ज्ञान-साधना कई बार औपचारिक उपलब्धि प्राप्त करने की प्रक्रिया में बदलती दिखाई देती है।
‘छोटी-सी उम्मीद’ में कवि बाजारवादी संस्कृति के प्रभाव को न्याय और ईमान जैसे नैतिक मूल्यों के साथ रखकर एक तीखा व्यंग्य रचता है—
न्याय और ईमान को बाजार में बिकने वाली वस्तुओं के रूपक में प्रस्तुत करना कविता की व्यंग्यात्मक शक्ति को बढ़ाता है। ‘ऑनलाइन कार्ट’ और ‘बाय नाओ, पे लेटर’ जैसी डिजिटल वाणिज्य की शब्दावली जब नैतिक मूल्यों के साथ जुड़ती है तो वर्तमान उपभोक्तावादी मानसिकता की विसंगति उजागर होती है। इसी कविता में आगे कवि सोशल मीडिया की संस्कृति और कविता के बदलते मूल्य को भी रेखांकित करता है—
‘कमेंट-बॉक्स में मरती कविता’ का बिम्ब समकालीन डिजिटल संसार की एक उल्लेखनीय विडंबना को अभिव्यक्त करता है। रचना की भावात्मक गहराई और उसकी तात्कालिक लोकप्रियता के बीच का अंतर यहाँ व्यंग्यात्मक ढंग से उभरता है।
‘रण जारी है’ की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण, संप्रेषणीय और समय-सापेक्ष है। कवि ने छोटे वाक्य-विन्यास,
विराम,
पंक्ति-विभाजन और संवादात्मक शैली के माध्यम से कथ्य को प्रभावशाली बनाया है। संग्रह की भाषा में एक ओर भारतीय मिथकीय और सांस्कृतिक प्रतीकों की उपस्थिति है तो दूसरी ओर आधुनिक जीवन की शब्दावली—‘कॉपी-पेस्ट’, ‘पीआर’, ‘ईएमआई’, ‘ऑनलाइन कार्ट’, ‘कमेंट-बॉक्स’ और ‘वायरल’—भी सहज रूप से प्रयुक्त हुई है। यह भाषिक सम्मिश्रण संग्रह को समकालीनता प्रदान करता है। कवि का व्यंग्य भी प्रायः इसी सहज भाषा से शक्ति प्राप्त करता है। अनेक कविताओं में कथ्य की स्पष्टता और सीधापन उनकी प्रमुख विशेषता है। कहीं-कहीं यही स्पष्टता कविता की व्यंजना और बहुअर्थी संभावनाओं को सीमित करती हुई भी प्रतीत होती है; फिर भी संग्रह की सामाजिक प्रतिबद्धता और संप्रेषणीयता के संदर्भ में यह शैली सार्थक सिद्ध होती है।
संग्रह की अंतिम कविता और शीर्षक-कविता ‘रण जारी है’ पूरे संग्रह की चेतना को एक बिंदु पर समेट देती है। कालरात्रि के सम्मुख कवि का संकल्प—
और अंततः—
—संग्रह की समूची वैचारिक यात्रा को एक दृढ़ निष्कर्ष प्रदान करता है। यहाँ ‘रण’ निराशा या विनाश का प्रतीक नहीं, बल्कि जीवन-संघर्ष, प्रतिरोध और जिजीविषा का रूपक है। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद संघर्ष को जारी रखने की चेतना ही कविता का मूल स्वर बन जाती है।
डॉ. विनोद कुमार का ‘रण जारी है’ समकालीन जीवन के विविध प्रश्नों को सामाजिक संवेदना,
सांस्कृतिक स्मृति, व्यंग्य,
आत्मान्वेषण और प्रतिरोध की चेतना के साथ अभिव्यक्त करने वाला कविता-संग्रह है। कवि की दृष्टि जीवन के बाहरी यथार्थ से लेकर मनुष्य के भीतरी संसार तक निरंतर गतिशील रहती है। इस संग्रह की केंद्रीय शक्ति उसकी जाग्रत मानवीय चेतना और प्रतिरोधधर्मी दृष्टि है। कवि समय के अंधकार को केवल दर्ज नहीं करता, बल्कि उसके बीच आशा, आत्मसम्मान, सत्य और संकल्प की लौ तलाशता है। उसकी कविता पाठक को निष्क्रिय दर्शक बने रहने के बजाय अपने समय और स्वयं के भीतर झाँकने के लिए प्रेरित करती है। इस अर्थ में ‘रण जारी है’ अपने शीर्षक की सार्थकता सिद्ध करता है। यह युद्ध बाहर जितना है, भीतर भी उतना ही है; यह संघर्ष व्यवस्था से जितना है, स्वयं से भी उतना ही है। और शायद इसी कारण संग्रह की अंतिम पंक्ति केवल कविता का अंत नहीं करती, बल्कि पाठक के भीतर एक प्रश्न और एक संकल्प छोड़ जाती है— ‘रुको! अभी रण जारी है।‘