अँधेरे दिनों में : अँधेरे समय में मनुष्य की तलाश करती कविताएं
समकालीन हिंदी कविता के वर्तमान परिदृश्य
में जब कविता अनेक बार वैचारिक घोषणापत्रों, सामाजिक प्रतिरोधों और निजी अनुभवों के बीच
अपना संतुलन तलाशती दिखाई देती है, तब विनोद अनिकेत का दूसरा
कविता-संग्रह ‘अँधेरे दिनों में’ एक ऐसे कवि की रचनात्मक उपस्थिति का प्रमाण बनकर सामने आता है, जो अपने समय की विसंगतियों को देखते हुए भी मनुष्य और उसकी आंतरिक संवेदना
को केंद्र में रखता है। बिम्ब-प्रतिबिम्ब प्रकाशन, फगवाड़ा से प्रकाशित यह संग्रह पाठक को पहली
दृष्टि में ही इसलिए आकर्षित करता है कि इसमें न तो कोई लेखकीय वक्तव्य है और न ही
कोई भूमिका। यह अनुपस्थिति दरअसल एक साहित्यिक उपस्थिति है। ऐसा प्रतीत होता है
मानो कवि अपनी कविताओं को किसी पूर्वनिर्धारित व्याख्या के दायरे में बाँधना नहीं
चाहता। वह पाठक के सामने अपनी कविताएं रखकर चुपचाप हट जाता है और कहता है—इन
शब्दों में जो अर्थ, जो अनुभव, जो
संवेदना और जो संकेत तुम्हें दिखाई दें, वे तुम्हारे हैं।
यद्यपि विनोद अनिकेत कृत कविता-संग्रह ‘अँधेरे
दिनों में’ की कुछ कविताएं अपनी अत्यधिक संक्षिप्तता और सहज कथन-शैली
के कारण प्रथम दृष्टया सामान्य अथवा सपाट प्रतीत होती हैं, किंतु
संग्रह की अनेक कविताएं ऐसी हैं जिनमें जीवन के गहन अनुभवों की तपिश, समय की पीड़ा और मनुष्य के अस्तित्वगत संघर्षों की अनुगूँज स्पष्ट रूप से
सुनी जा सकती है। इन कविताओं की शक्ति उनके शब्दों के विस्तार में नहीं, बल्कि उनके भीतर निहित अर्थ-स्तरों में निहित है। वे पाठक के सामने किसी
निष्कर्ष को आरोपित नहीं करतीं, बल्कि उसे सोचने, ठहरने और अपने अनुभवों के आलोक में कविता को पुनः रचने के लिए प्रेरित
करती हैं। यही कारण है कि ये कविताएं केवल पढ़ी नहीं जातीं, बल्कि
पाठक के अंतर्मन में उतरकर उसकी अपनी संवेदनाओं का हिस्सा बन जाती हैं। संग्रह की
कविता ‘रस’ इस संदर्भ में विशेष
रूप से उल्लेखनीय है। कवि लिखता है—
“इसे परिवर्तन कहें
या पुनरावर्तन ?
होता है
बदलता है
फिर होता है।
बदलता नहीं
तो बस
बदलते रहना।”
(रस, पृष्ठ-23)
दृष्टिगत रूप से अत्यंत सरल प्रतीत होने
वाली ये पंक्तियां अपने भीतर गहरे दार्शनिक और सामाजिक निहितार्थ समेटे हुए हैं।
कवि यहाँ परिवर्तन की उस अवधारणा पर प्रश्नचिह्न अंकित करता है, जिसे
आधुनिक सभ्यता अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानती रही है। वस्तुतः वर्तमान युग परिवर्तन
का युग कहा जाता है। विज्ञान, तकनीक, संचार,
राजनीति, अर्थव्यवस्था और सामाजिक संबंधों के
स्वरूप निरंतर बदल रहे हैं। प्रतिदिन कुछ नया घटित हो रहा है और मनुष्य स्वयं को
अभूतपूर्व परिवर्तन के दौर में होने का अनुभव करता है। किंतु कवि इस तथाकथित
परिवर्तन के वास्तविक स्वरूप को लेकर संशय व्यक्त करता है। कविता का मूल प्रश्न— ‘इसे परिवर्तन कहें या पुनरावर्तन?’ —दरअसल आधुनिक समय की सबसे बड़ी विडंबना को उद्घाटित करता है। कवि संकेत
करता है कि जो कुछ बदलता हुआ दिखाई देता है, वह संभवतः केवल
बाहरी आवरण है; उसके भीतर वही पुरानी प्रवृत्तियाँ, वही सत्ता-संबंध, वही संघर्ष और वही मानवीय दुर्बलताएं
निरंतर सक्रिय रहती हैं। इतिहास स्वयं को नए रूपों में दोहराता रहता है। सत्ता
बदलती है, किंतु सत्ता की प्रवृत्ति नहीं बदलती; विचारधाराएं बदलती हैं, किंतु वर्चस्व की आकांक्षा
यथावत बनी रहती है; तकनीक बदलती है, किंतु
मनुष्य की असुरक्षाएं और महत्वाकांक्षाएं वैसी ही बनी रहती हैं। इस दृष्टि से
परिवर्तन और पुनरावर्तन के बीच की रेखा धुँधली पड़ जाती है। अंतिम पंक्तियां— ‘बदलता नहीं/तो/बस/बदलते रहना।‘ विशेष रूप से
विचारणीय हैं। यहाँ कवि आधुनिक मनुष्य की उस मानसिकता की ओर संकेत करता है जिसमें
परिवर्तन स्वयं एक मूल्य बन गया है, चाहे उसके पीछे कोई
सार्थक उद्देश्य हो या न हो। आज का समाज नवीनता के मोह में इस सीमा तक बँध गया है
कि स्थायित्व, परंपरा और गहराई जैसे मूल्य उपेक्षित होते जा
रहे हैं। परिवर्तन अब जीवन की आवश्यकता कम और फैशन अधिक प्रतीत होने लगा है।
परिणामस्वरूप मनुष्य निरंतर बदलते रहने की प्रक्रिया में उलझ जाता है, किंतु उसके अस्तित्व के मूल प्रश्न अनुत्तरित ही बने रहते हैं। वस्तुतः
‘रस’ कविता समय, इतिहास और मनुष्य की नियति से जुड़े एक बड़े
प्रश्न को सामने लाती है। यह कविता पाठक को यह सोचने के लिए विवश करती है कि क्या
वास्तव में हम बदल रहे हैं, अथवा केवल परिवर्तन का भ्रम जी
रहे हैं। यही प्रश्न इस कविता को समकालीन संदर्भों में अत्यंत प्रासंगिक और
विचारोत्तेजक बना देता है। विनोद अनिकेत की काव्य-दृष्टि की विशेषता भी यही है कि
वे अत्यंत सामान्य प्रतीत होने वाले शब्दों के माध्यम से जटिल दार्शनिक और सामाजिक
विमर्शों को उद्घाटित करने में समर्थ दिखाई देते हैं। ‘रस’ कविता इस क्षमता का
सशक्त उदाहरण है।
विनोद अनिकेत के कविता-संग्रह ‘अँधेरे
दिनों में’ की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि उसकी कविताएं अपने
छोटे कलेवर में समय की बड़ी सच्चाइयों को समेटने का सामर्थ्य रखती हैं। कवि किसी
वैचारिक घोषणापत्र की मुद्रा में खड़ा होकर अपने विचारों का प्रतिपादन नहीं करता, बल्कि
संकेतों, प्रतीकों और सूक्ष्म कथनों के माध्यम से पाठक को उस
यथार्थ से साक्षात्कार कराता है जिसे हम प्रतिदिन जीते तो हैं, किंतु उसकी गहराइयों को समझने का अवकाश प्रायः नहीं निकाल पाते। संग्रह की
कविता ‘मुमुक्षा’ इसी प्रकार की
एक विचारोत्तेजक रचना है, जिसमें कवि समकालीन समय की वैचारिक
जटिलताओं और अभिव्यक्ति के संकट को अत्यंत संयत किंतु प्रभावपूर्ण ढंग से
अभिव्यक्त करता है—
“अब तुम
सत्य नहीं बोल सकते
तुम
नहीं कह सकते
अविद्या अनादि है।
तुम नहीं कह सकते
बहुत कुछ
जो सनातन है।”
(मुमुक्षा, पृष्ठ-36)
ये पंक्तियां पहली दृष्टि में जितनी सरल
प्रतीत होती हैं, उनके भीतर उतनी ही गहन सामाजिक, सांस्कृतिक
और दार्शनिक व्यंजना निहित है। कवि यहाँ किसी विशिष्ट व्यक्ति अथवा परिस्थिति का
उल्लेख नहीं करता, बल्कि पूरे युग-बोध को संबोधित करता है। ‘अब तुम सत्य नहीं बोल सकते’ —यह कथन मात्र
अभिव्यक्ति की बाधा का संकेत नहीं है, बल्कि उस मानसिक और
सामाजिक वातावरण की ओर इंगित करता है जिसमें सत्य का उच्चारण स्वयं एक जोखिमपूर्ण
कार्य बनता जा रहा है। विडंबना यह है कि वर्तमान समय को सूचना-विस्फोट, तकनीकी उन्नति और अभिव्यक्ति की अभूतपूर्व स्वतंत्रता का युग कहा जाता है।
संचार के साधन पहले से कहीं अधिक विस्तृत हैं, विचारों के
आदान-प्रदान के मंच पहले से कहीं अधिक उपलब्ध हैं, और
व्यक्ति के पास अपनी बात रखने के असंख्य माध्यम हैं। किंतु इसी के समानांतर एक ऐसी
स्थिति भी निर्मित हुई है जिसमें व्यक्ति अपने विचारों को व्यक्त करने से पूर्व
अनेक प्रकार की आशंकाओं, सामाजिक प्रतिक्रियाओं, वैचारिक आग्रहों और सांस्कृतिक दबावों का आकलन करने के लिए बाध्य हो जाता
है। परिणामतः अभिव्यक्ति की बाह्य स्वतंत्रता के बावजूद भीतर एक अदृश्य भय का
संसार निर्मित होता जाता है।
कविता में प्रयुक्त शब्द ‘सत्य’ विशेष रूप से
ध्यान आकर्षित करता है। यहाँ सत्य का आशय केवल वस्तुगत तथ्य या तर्कसंगत निष्कर्ष
नहीं है। यह सत्य मनुष्य की स्वतंत्र चेतना, उसके आत्मबोध, उसकी
वैचारिक स्वायत्तता और उसके अनुभवजन्य निष्कर्षों का प्रतीक है। कवि संकेत करता है
कि जब समाज किसी पूर्वनिर्धारित विचार, मत या मान्यता को
अंतिम सत्य मानने लगता है, तब स्वतंत्र चिंतन की संभावनाएं
क्रमशः क्षीण होने लगती हैं। ऐसे में व्यक्ति केवल वही कह सकता है जो स्वीकृत है;
जो असुविधाजनक है, जो स्थापित धारणाओं को
चुनौती देता है, उसे कहने का साहस दुर्लभ होता जाता है। ‘तुम नहीं कह सकते / बहुत कुछ / जो सनातन है’ —इन
पंक्तियों में भी एक गहरी विडंबना निहित है। यहाँ कवि उन शाश्वत मानवीय मूल्यों,
प्रश्नों और अनुभवों की ओर संकेत करता है जिन्हें समय और सत्ता की
सीमाएं बाँध नहीं सकतीं। किंतु आधुनिक समय में वही शाश्वत सत्य भी विवाद, पूर्वाग्रह और वैचारिक संघर्षों के घेरे में आ गए हैं। इस प्रकार
‘मुमुक्षा’ केवल अभिव्यक्ति के संकट की कविता नहीं रह जाती, बल्कि
वह स्वतंत्र विचार और आत्मिक मुक्ति की आकांक्षा की कविता बन जाती है। शीर्षक
‘मुमुक्षा’— अर्थात् मुक्ति की इच्छा—इस अर्थ को और अधिक व्यापक बना देता है। यह
मुक्ति केवल सांसारिक बंधनों से नहीं, बल्कि विचारों पर लगाए
गए अदृश्य प्रतिबंधों से भी संबंधित है। इसी क्रम में संग्रह की अत्यंत मार्मिक और
अर्थगर्भित कविता ‘डिमेंशिया’ आधुनिक
मनुष्य की अस्तित्वगत विडंबना को अत्यंत सूक्ष्मता के साथ अभिव्यक्त करती है। कवि
लिखता है—
“अपनी जेब से
अचानक ही
चोरी हो गया हूँ
मैं।”
(डिमेंशिया, पृष्ठ-38)
यह पंक्तियां अपने भीतर अनुभव और अर्थ का एक
विराट संसार समेटे हुए है। सामान्यतः ‘डिमेंशिया’ शब्द स्मृति-भ्रंश अथवा भूलने की
बीमारी से संबंधित माना जाता है, किंतु कवि इस शब्द को केवल चिकित्सकीय
अर्थों तक सीमित नहीं रखता। वह इसे आधुनिक जीवन की एक व्यापक मानवीय स्थिति के रूप
में रूपायित करता है। कविता का सबसे महत्त्वपूर्ण बिंब है— ‘अपनी
जेब से चोरी हो गया हूँ मैं।‘ सामान्यतः जेब से कोई वस्तु
चोरी होती है, किंतु यहाँ स्वयं व्यक्ति ही अपनी जेब से चोरी
हो गया है। यह असामान्य कथन पाठक को चौंकाता है और उसे कविता के भीतर निहित गहरे
अर्थों की ओर ले जाता है। वस्तुतः यह बिंब आधुनिक मनुष्य की आत्म-विस्थापन की
स्थिति का अत्यंत सशक्त रूपक है। आज का मनुष्य बाह्य उपलब्धियों, उपभोक्तावादी आकांक्षाओं, सामाजिक प्रतिस्पर्धा और
तकनीकी व्यस्तताओं के बीच इस प्रकार उलझ गया है कि वह धीरे-धीरे स्वयं से ही दूर
होता जा रहा है। उसके पास साधन हैं, सुविधाएं हैं, उपलब्धियाँ हैं, किंतु वह अपने वास्तविक अस्तित्व से
कटता चला जा रहा है। यह कविता उस त्रासदी को रेखांकित करती है जिसमें व्यक्ति अपने
ही जीवन में एक अनुपस्थित उपस्थिति बन जाता है। वह अपने संबंधों में उपस्थित है,
अपने कार्यों में सक्रिय है, समाज में दिखाई
देता है, किंतु भीतर से स्वयं को खो चुका है। उसकी स्मृतियाँ
धुँधली हो रही हैं, उसकी पहचान खंडित हो रही है और उसका
आत्मबोध लगातार क्षीण होता जा रहा है। यही कारण है कि कवि स्वयं को किसी बाहरी
शक्ति द्वारा नहीं, बल्कि अपनी ही जेब से चोरी हो गया हुआ
अनुभव करता है। यह आत्म-चोरी की स्थिति है— एक ऐसी स्थिति जिसमें मनुष्य अपने सबसे
मूल्यवान तत्व, अर्थात् अपने ‘स्व’ को खो देता है। वस्तुतः
‘डिमेंशिया’ कविता आधुनिक सभ्यता की एक गहरी आलोचना भी है। यह उस युग की तस्वीर
प्रस्तुत करती है जिसमें मनुष्य संसार को जीतने की आकांक्षा में स्वयं को ही खो
बैठा है। इस दृष्टि से यह कविता केवल स्मृति-भ्रंश का बिंब नहीं, बल्कि आत्म-परिचय के संकट, अस्तित्वगत रिक्तता और
मानवीय विस्थापन की गहन अनुभूति का कलात्मक रूपांतरण है।
‘मुमुक्षा’ और ‘डिमेंशिया’—दोनों कविताएं
मिलकर विनोद अनिकेत की काव्य-दृष्टि के उस पक्ष को उद्घाटित करती हैं जहाँ वे अपने
समय की बाहरी घटनाओं से अधिक मनुष्य के भीतर घट रही प्रक्रियाओं को समझने का
प्रयास करते हैं। एक कविता विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के संकट को स्वर
देती है, तो दूसरी आत्म-पहचान के क्षरण की पीड़ा को। दोनों
ही कविताएं अपने लघु आकार के बावजूद गहन दार्शनिक और मानवीय प्रश्नों को स्पर्श
करती हैं तथा पाठक को अपने समय और स्वयं के संबंध में गंभीर आत्ममंथन के लिए
प्रेरित करती हैं। यही उनकी साहित्यिक सार्थकता और स्थायी महत्ता है।
विनोद अनिकेत की काव्य-दृष्टि का एक
उल्लेखनीय पक्ष यह है कि वे जीवन और समाज की जटिलतम सच्चाइयों को अत्यंत साधारण
प्रतीत होने वाले बिंबों और संक्षिप्त कथनों के माध्यम से व्यक्त करने की क्षमता
रखते हैं। उनकी कविताएं किसी वैचारिक शोर या भाषिक आडंबर का सहारा नहीं लेतीं, बल्कि
अपने मितकथन में ही गहन अर्थ-संभावनाओं का संसार रचती हैं। ‘अँधेरे दिनों में’ संग्रह की कविता ‘हिंसा’ इसी प्रकार की एक अत्यंत प्रभावशाली और
विचारोत्तेजक रचना है, जिसमें कवि हिंसा की पारंपरिक अवधारणा
को नए अर्थ-क्षेत्र प्रदान करता है—
“रौंदता नहीं
किसी को
बरगद
बस
अपने नीचे
पनपने नहीं देता।”
(हिंसा, पृष्ठ-41)
इन पंक्तियों का पहला प्रभाव उनकी सहजता है, किंतु
जैसे-जैसे पाठक इनके भीतर उतरता है, कविता के अर्थ-स्तर
क्रमशः खुलते जाते हैं। सामान्यतः हिंसा का अर्थ किसी पर प्रत्यक्ष आक्रमण करना,
उसे पीड़ा पहुँचाना, उसका दमन करना अथवा उसके
अस्तित्व को नष्ट करना माना जाता है। किंतु कवि यहाँ हिंसा की उस सूक्ष्म और
अदृश्य प्रकृति को पहचानता है, जो प्रत्यक्ष रूप से दिखाई
नहीं देती, फिर भी अपने प्रभाव में कहीं अधिक व्यापक और
विनाशकारी होती है। कविता में प्रयुक्त ‘बरगद’ का बिंब अत्यंत अर्थगर्भित और बहुस्तरीय है। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा
में बरगद स्थायित्व, विस्तार, संरक्षण
और विराटता का प्रतीक माना जाता है। उसकी विशाल छाया आश्रय का बोध कराती है। किंतु
कवि इस परिचित प्रतीक को एक नए अर्थ में रूपांतरित करता है। वह बताता है कि बरगद
किसी को रौंदता नहीं, किसी पर प्रत्यक्ष आक्रमण नहीं करता,
किंतु उसकी विराट छाया के नीचे अन्य पौधों के लिए विकसित होने की
संभावनाएं समाप्त हो जाती हैं। वे सूर्य का प्रकाश नहीं पा सकते, वे अपने स्वाभाविक विस्तार की दिशा में अग्रसर नहीं हो सकते। परिणामतः
उनका विकास अवरुद्ध हो जाता है। यहीं कविता का वास्तविक सामाजिक और वैचारिक आशय
उद्घाटित होता है। कवि संकेत करता है कि समाज में अनेक प्रकार की शक्तियाँ ऐसी
होती हैं जो प्रत्यक्ष रूप से किसी का उत्पीड़न नहीं करतीं, परंतु
अपनी प्रभुत्वशाली उपस्थिति के कारण दूसरों के विकास के मार्ग अवरुद्ध कर देती
हैं। यह स्थिति केवल राजनीतिक सत्ता तक सीमित नहीं है; परिवार,
समाज, शैक्षणिक संस्थानों, सांस्कृतिक संरचनाओं और यहाँ तक कि व्यक्तिगत संबंधों में भी देखी जा सकती
है। कई बार कोई व्यक्ति अथवा संस्था इतनी प्रभावशाली हो जाती है कि उसके आसपास नए
विचार, नई प्रतिभाएं और नई संभावनाएं विकसित ही नहीं हो
पातीं। इस दृष्टि से कविता ‘हिंसा’ सत्ता और वर्चस्व की उस संरचना की पहचान करती
है, जिसे आधुनिक समाजशास्त्र और राजनीतिक चिंतन में संरचनात्मक
हिंसा कहा जाता है। यह ऐसी हिंसा है जो दिखाई नहीं देती, जिसके कोई प्रत्यक्ष घाव नहीं होते, किंतु जो
व्यक्तियों और समुदायों की संभावनाओं का क्रमशः क्षरण करती रहती है। यह अवसरों की
असमानता, संसाधनों के असंतुलित वितरण और प्रभुत्ववादी
मानसिकता के रूप में कार्य करती है। विनोद अनिकेत ने इस जटिल अवधारणा को जिस सघनता
के साथ व्यक्त किया है, वह उनकी काव्य-प्रतिभा का प्रमाण है।
समकालीन संदर्भों में यह कविता और भी अधिक
प्रासंगिक प्रतीत होती है। आज का समाज प्रत्यक्ष हिंसा से अधिक अदृश्य और संस्थागत
हिंसा का शिकार है। व्यक्ति को दबाया नहीं जाता, किंतु उसे आगे बढ़ने के
अवसर नहीं दिए जाते; उसे रोका नहीं जाता, किंतु उसके लिए मार्ग इतने संकरे कर दिए जाते हैं कि उसका विकास स्वयं ही
अवरुद्ध हो जाए। कविता इसी विडंबनापूर्ण यथार्थ को उजागर करती है। इसलिए यह रचना
केवल प्रकृति के एक दृश्य का वर्णन नहीं, बल्कि सामाजिक
संरचनाओं के भीतर छिपी हुई हिंसक प्रवृत्तियों का गहन विश्लेषण है। इसी प्रकार संग्रह
की कविता ‘दम्भ’ भी मनुष्य के
मनोविज्ञान और उसकी आत्मविरोधी प्रवृत्तियों का अत्यंत सूक्ष्म उद्घाटन करती है।
कवि लिखता है—
“आदमी को
एक ही बेचैनी है
वह
चैन से
जीना चाहता है।
बस
चाहता भर है।”
(दम्भ, पृष्ठ-54)
प्रथम दृष्टि में ये पंक्तियां मानवीय
आकांक्षा का एक सामान्य कथन प्रतीत होती हैं, किंतु कविता की अंतिम पंक्ति—“बस चाहता भर है”—समूचे कथ्य को एक गहरी
व्यंग्यात्मकता प्रदान कर देती है। यही वह बिंदु है जहाँ कविता अपने वास्तविक अर्थ
तक पहुँचती है। मनुष्य की समस्त गतिविधियों के मूल में यदि किसी एक आकांक्षा को
खोजा जाए, तो वह संभवतः शांति, संतोष
और सुखपूर्ण जीवन की आकांक्षा ही होगी। प्रत्येक व्यक्ति संघर्ष करता है, श्रम करता है, संसाधन अर्जित करता है और संबंधों का
निर्माण करता है ताकि वह चैन और संतोष के साथ जीवन जी सके। किंतु कवि का सूक्ष्म अवलोकन
यह बताता है कि यह चैन केवल इच्छा के स्तर पर ही बना रहता है। व्यवहार में मनुष्य
स्वयं ऐसे कार्य करता है जो उसके जीवन से शांति और संतुलन को दूर ले जाते हैं। यहाँ
कविता का शीर्षक ‘दम्भ’ विशेष
रूप से अर्थपूर्ण हो उठता है। कवि संकेत करता है कि मनुष्य का अहंकार, उसकी महत्वाकांक्षाएँ, उसकी प्रतिस्पर्धी प्रवृत्ति
और निरंतर अधिक पाने की लालसा ही उसके अशांत जीवन के वास्तविक कारण हैं। वह चैन
चाहता तो है, किंतु अपने दंभ को त्यागने के लिए तैयार नहीं
होता। वह संतोष की बात करता है, किंतु असंतोष को ही अपनी
प्रगति का साधन बना लेता है। वह सरल जीवन की कामना करता है, किंतु
जटिलताओं का निर्माण स्वयं करता चलता है। इस प्रकार यह कविता आधुनिक जीवन की एक
गहरी मनोवैज्ञानिक विडंबना को उद्घाटित करती है। आज का मनुष्य जितनी सुविधाओं,
संसाधनों और तकनीकी साधनों से घिरा हुआ है, शायद
इतिहास में कभी नहीं रहा; फिर भी उसकी बेचैनी और असंतोष
निरंतर बढ़ते जा रहे हैं। बाहरी उपलब्धियों की यह अंतहीन दौड़ उसे उस आंतरिक शांति
से दूर ले जाती है जिसकी वह निरंतर कामना करता है। कवि इसी विरोधाभास को अत्यंत
मार्मिक व्यंग्य के साथ प्रस्तुत करता है। वस्तुतः ‘हिंसा’ और ‘दम्भ’ दोनों कविताएं
मिलकर समकालीन मनुष्य और समाज के दो महत्त्वपूर्ण संकटों को उद्घाटित करती हैं।
पहली कविता बाहरी संरचनाओं में छिपी हुई दमनकारी प्रवृत्तियों को पहचानती है,
जबकि दूसरी मनुष्य के भीतर सक्रिय आत्मविरोधी प्रवृत्तियों को सामने
लाती है। एक कविता सामाजिक यथार्थ की पड़ताल करती है, तो
दूसरी मानवीय मनोविज्ञान की। दोनों ही कविताएं अपने संक्षिप्त कलेवर में गहन
वैचारिक ऊर्जा और अनुभवजन्य प्रामाणिकता समेटे हुए हैं। यही कारण है कि वे पाठक को
केवल प्रभावित ही नहीं करतीं, बल्कि उसे अपने समय, समाज और स्वयं के भीतर झाँकने के लिए भी विवश करती हैं। विनोद अनिकेत की
काव्य-दृष्टि की सार्थकता इसी में निहित है कि वे अल्प शब्दों में व्यापक
जीवन-सत्य को उद्घाटित करने में समर्थ दिखाई देते हैं।
विनोद अनिकेत की कविताओं का एक महत्त्वपूर्ण
गुण यह है कि वे जीवन के सामान्य और प्रतिदिन घटित होने वाले अनुभवों के भीतर छिपे
हुए गहरे दार्शनिक और सामाजिक अर्थों को पहचानने की अद्भुत क्षमता रखती हैं। उनकी
कविता किसी असाधारण घटना की तलाश नहीं करती, बल्कि साधारण जीवन-स्थितियों के भीतर निहित
असाधारण सत्य को उद्घाटित करती है। यही कारण है कि उनकी अनेक कविताएं पढ़ते समय
ऐसा अनुभव होता है मानो कवि किसी बाहरी यथार्थ का नहीं, बल्कि
हमारे अपने जीवन और हमारी अपनी मानसिक संरचनाओं का चित्र प्रस्तुत कर रहा हो।
संग्रह ‘अँधेरे दिनों में’ की
कविता ‘परिछिन्नता’ इसी प्रकार
की एक अत्यंत अर्थगर्भित रचना है, जिसमें आधुनिक सभ्यता की
एक गहरी विडंबना अत्यंत सहज किंतु प्रभावशाली ढंग से व्यक्त हुई है—
“कमरा
बना लिया
तब
अहसास हुआ
मैं तो
अपने हिस्से का
आकाश
खुद ही
छोटा कर बैठा।”
(परिछिन्नता, पृष्ठ-88)
दृष्टिगत रूप से यह कविता एक सामान्य अनुभव
का कथन प्रतीत होती है। कोई व्यक्ति अपने लिए एक कमरा बनाता है, एक
सुरक्षित और व्यवस्थित स्थान निर्मित करता है, किंतु उसी
क्षण उसे यह अनुभूति होती है कि इस निर्माण की प्रक्रिया में उसने अपने हिस्से के
खुले आकाश को स्वयं ही सीमित कर लिया है। कविता का यही साधारण-सा दृश्य धीरे-धीरे
एक व्यापक सामाजिक और दार्शनिक रूपक का रूप ग्रहण कर लेता है। यहाँ ‘कमरा’ केवल ईंट, पत्थर और
सीमेंट से निर्मित कोई भौतिक संरचना नहीं है; वह मनुष्य
द्वारा निर्मित उन सभी सीमाओं का प्रतीक है जिन्हें वह सुरक्षा, सुविधा और स्थायित्व के नाम पर अपने चारों ओर खड़ा करता है। दूसरी ओर ‘आकाश’ स्वतंत्रता, विस्तार,
संभावनाओं और अनंतता का प्रतीक है। कवि अत्यंत सूक्ष्मता के साथ यह
संकेत करता है कि मनुष्य जब अपने लिए सीमित और सुरक्षित संसार निर्मित करता है,
तब वह अनजाने में अपने जीवन की व्यापक संभावनाओं को भी संकुचित कर
देता है। आधुनिक शहरी सभ्यता का संपूर्ण विकास इसी विरोधाभास पर आधारित दिखाई देता
है। मनुष्य ने अपने जीवन को अधिक सुरक्षित, अधिक सुविधाजनक
और अधिक व्यवस्थित बनाने के लिए असंख्य साधनों का निर्माण किया है। ऊँची-ऊँची
इमारतें, बंद कॉलोनियाँ, निजी दायरे और
व्यक्तिगत सुविधाएं उसके जीवन का हिस्सा बनती चली गई हैं। किंतु इसी प्रक्रिया में
उसका प्रकृति से संबंध कमजोर हुआ है, सामाजिक संवाद सीमित
हुआ है और उसके अनुभवों का क्षितिज क्रमशः संकुचित होता गया है। घरों का आकार बढ़ा
है, लेकिन जीवन का विस्तार घटा है; सुविधाएं
बढ़ी हैं, किंतु आत्मीयता कम हुई है; संसाधन
बढ़े हैं, किंतु मनुष्य की आंतरिक स्वतंत्रता सिकुड़ती गई
है। इस कविता का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष यह है कि वह केवल भौतिक सीमाओं की चर्चा
नहीं करती। यह रचना मनुष्य की मानसिक और भावनात्मक परिधियों पर भी उतनी ही गहरी
टिप्पणी करती है। आज व्यक्ति केवल अपने घरों में ही नहीं, अपने
विचारों में भी बंद होता जा रहा है। वह अपने पूर्वाग्रहों, अपनी
सुविधाओं और अपनी निश्चित धारणाओं के भीतर इस प्रकार कैद हो गया है कि उसके लिए नए
अनुभवों, नए विचारों और नए संबंधों के प्रति खुला रहना कठिन
होता जा रहा है। इस प्रकार ‘परिछिन्नता’ केवल एक कमरे और आकाश की कविता नहीं रह
जाती, बल्कि वह आधुनिक मनुष्य की आत्मनिर्मित सीमाओं की
कविता बन जाती है। कविता का शीर्षक भी अत्यंत सार्थक है। ‘परिछिन्नता’ अर्थात् सीमाबद्धता, संकुचन और बंधन। कवि संकेत करता है कि आधुनिक मनुष्य की सबसे बड़ी त्रासदी
यह नहीं है कि उस पर बाहर से सीमाएं आरोपित की जा रही हैं, बल्कि
यह है कि वह स्वयं अपनी सीमाओं का निर्माता बन गया है। उसने अपने लिए जो दीवारें
खड़ी की हैं, वही उसके आकाश को छोटा कर रही हैं। इस दृष्टि
से यह कविता आधुनिक जीवन की आत्मालोचनात्मक व्याख्या प्रस्तुत करती है। इसी क्रम
में संग्रह की कविता ‘ज़िंदगी’ आधुनिक
उपभोक्तावादी समाज की मानसिकता पर अत्यंत तीखा और सारगर्भित व्यंग्य प्रस्तुत करती
है। कवि लिखता है—
“तलाश
सिर्फ एक
कंफ़र्ट ज़ोन की।
इससे
बढ़कर
कुछ नहीं
कुछ भी नहीं।”
(ज़िंदगी, पृष्ठ-115)
यह काव्य-पंक्तियाँ अपने भीतर समकालीन
जीवन-दृष्टि की एक गहरी आलोचना समेटे हुए है। आज का मनुष्य जिस सामाजिक और आर्थिक
संरचना में जीवन व्यतीत कर रहा है, वहाँ सुविधा एक आवश्यकता भर नहीं रह गई है,
बल्कि वह जीवन का सर्वोच्च मूल्य बनती जा रही है। सफलता का अर्थ
अधिक सुविधा, अधिक सुरक्षा और अधिक आराम प्राप्त कर लेना
माना जाने लगा है। व्यक्ति का अधिकांश श्रम, संघर्ष और
आकांक्षा इसी लक्ष्य की प्राप्ति में व्यतीत होती है। कवि इस मानसिकता को अत्यंत
सूक्ष्म दृष्टि से पहचानता है। वह देखता है कि आधुनिक मनुष्य का समस्त जीवन
धीरे-धीरे एक ‘कंफ़र्ट ज़ोन’ की
खोज में सिमटता जा रहा है। वह ऐसे वातावरण की तलाश में है जहाँ कोई चुनौती न हो,
कोई जोखिम न हो, कोई असुविधा न हो और कोई
अनिश्चितता न हो। किंतु जीवन का स्वभाव इससे भिन्न है। जीवन का वास्तविक विस्तार
तो संघर्ष, साहस, जिज्ञासा और नए
अनुभवों की स्वीकृति में निहित होता है। जो व्यक्ति केवल सुविधा की तलाश में रहता
है, वह धीरे-धीरे अपने विकास की संभावनाओं को स्वयं सीमित कर
लेता है। पंक्तियां— ‘इससे बढ़कर/कुछ नहीं/कुछ भी नहीं।‘ एक गहरी विडंबना को व्यक्त करती हैं। कवि यहाँ संकेत करता है कि आधुनिक
मनुष्य ने जीवन के व्यापक उद्देश्यों—ज्ञान, सृजन, संवेदना, आत्मविकास, सामाजिक
उत्तरदायित्व और मानवीय संबंधों— को पीछे छोड़कर सुविधा को ही अंतिम लक्ष्य मान
लिया है। परिणामतः जीवन की समस्त ऊँचाइयाँ और गहराइयाँ सिकुड़कर एक सीमित
उपभोक्तावादी आकांक्षा में बदल गई हैं। समकालीन संदर्भों में यह कविता अत्यंत
प्रासंगिक प्रतीत होती है। आज का समय प्रतिस्पर्धा, बाज़ारवाद
और उपभोक्तावादी संस्कृति का समय है। इस संस्कृति ने मनुष्य को यह विश्वास दिला
दिया है कि सुख का अर्थ अधिकाधिक सुविधा प्राप्त करना है। किंतु विडंबना यह है कि
जितनी अधिक सुविधाएं बढ़ती जाती हैं, उतनी ही अधिक असुरक्षाएं
और बेचैनियाँ भी जन्म लेती हैं। सुविधा का यह संसार मनुष्य को सुरक्षित तो बनाता
है, किंतु साहसी नहीं; आरामदेह तो
बनाता है, किंतु रचनात्मक नहीं। इस प्रकार ‘परिछिन्नता’ और
‘ज़िंदगी’ दोनों कविताएं आधुनिक सभ्यता के दो परस्पर संबद्ध संकटों को उद्घाटित
करती हैं। पहली कविता मनुष्य द्वारा निर्मित सीमाओं और उसके सिकुड़ते हुए
जीवन-आकाश की चर्चा करती है, जबकि दूसरी कविता उन सीमाओं के
मूल में सक्रिय सुविधा-केंद्रित मानसिकता का विश्लेषण करती है। एक कविता बताती है
कि मनुष्य ने अपना आकाश क्यों खोया, और दूसरी यह कि उसने उसे
किस मूल्य पर खोया। दोनों कविताएं मिलकर आधुनिक जीवन की एक गहन आलोचना प्रस्तुत
करती हैं और पाठक को यह सोचने के लिए विवश करती हैं कि कहीं सुविधा और सुरक्षा की
अंधी दौड़ में उसने भी अपने हिस्से का आकाश तो छोटा नहीं कर लिया है। यही इन
कविताओं की वैचारिक शक्ति और साहित्यिक सार्थकता है।
विनोद अनिकेत की कविताओं की सबसे बड़ी
विशेषता यह है कि वे जीवन के अत्यंत सामान्य प्रतीत होने वाले अनुभवों के भीतर
निहित गहन मानवीय और दार्शनिक सत्य को खोज निकालती हैं। उनकी कविता बाहरी घटनाओं
की अपेक्षा मनुष्य के भीतर घटित होने वाली प्रक्रियाओं को अधिक महत्व देती है। यही
कारण है कि उनकी अनेक कविताएं पढ़ते समय पाठक को ऐसा अनुभव होता है मानो कवि उसके
अपने जीवन,
उसकी अपनी संवेदनाओं और उसके भीतर छिपे उन प्रश्नों को शब्द दे रहा
हो, जिन्हें वह स्वयं भी स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं कर पाता।
संग्रह ‘अँधेरे दिनों में’ की
कविता ‘धूल’ इसी प्रकार की एक
सूक्ष्म, मार्मिक और चिंतनोत्तेजक रचना है, जिसमें कवि मनुष्य की मनोवृत्ति तथा जीवन के गहरे अनुभवों के बीच मौजूद
विरोधाभास को अत्यंत सहज भाषा में अभिव्यक्त करता है—
“मैंने
किसी को भी
प्रार्थनाओं में
अपने लिए
उदासी मांगते नहीं सुना।”
(धूल, पृष्ठ-127)
सामान्यतः मनुष्य की समस्त कामनाएं सुख, सफलता,
समृद्धि और प्रसन्नता के इर्द-गिर्द केंद्रित रहती हैं। प्रत्येक
व्यक्ति अपनी प्रार्थनाओं में स्वास्थ्य, वैभव, सम्मान और आनंद की कामना करता है। कोई भी व्यक्ति स्वेच्छा से दुख,
पीड़ा अथवा उदासी की याचना नहीं करता। कवि इसी सार्वभौमिक मानवीय
प्रवृत्ति की ओर संकेत करता है। किंतु कविता का वास्तविक अर्थ केवल इस सामान्य
तथ्य की पुनरुक्ति नहीं है, बल्कि वह इसके भीतर छिपे हुए एक
गहरे जीवन-सत्य को उद्घाटित करती है। वस्तुतः जीवन का इतिहास यह प्रमाणित करता है
कि मनुष्य के व्यक्तित्व का वास्तविक परिष्कार प्रायः सुख की परिस्थितियों में
नहीं, बल्कि दुख और अभाव के अनुभवों से होकर होता है।
प्रसन्नता जीवन को सहज बना सकती है, किंतु संवेदनशीलता
प्रायः पीड़ा से जन्म लेती है। आनंद व्यक्ति को संतुष्टि दे सकता है, किंतु आत्मबोध अक्सर विषाद के क्षणों में ही प्राप्त होता है। साहित्य,
कला, दर्शन और आध्यात्मिक चिंतन की अनेक महान
उपलब्धियों के पीछे जीवन के गहन दुखों और अंतर्द्वंद्वों का अनुभव सक्रिय रहा है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो उदासी केवल एक नकारात्मक मनःस्थिति नहीं, बल्कि आत्म-चिंतन, आत्म-परिष्कार और आत्म-ज्ञान का
एक महत्त्वपूर्ण माध्यम भी है। कवि का आशय यही प्रतीत होता है कि मनुष्य जीवन में
उन अनुभवों की कामना तो नहीं करता, किंतु वही अनुभव उसे जीवन
के गहरे अर्थों से परिचित कराते हैं। उदासी मनुष्य को अपने भीतर लौटने का अवसर
देती है। वह उसे बाहरी कोलाहल से अलग करके स्वयं से संवाद करने की क्षमता प्रदान
करती है। इसलिए कविता के भीतर ‘उदासी’ केवल एक भाव नहीं, बल्कि
एक ऐसी चेतनात्मक अवस्था का प्रतीक बन जाती है जो मनुष्य को अपने अस्तित्व की
गहराइयों तक पहुँचने का मार्ग प्रदान करती है। कविता का शीर्षक ‘धूल’ भी इस संदर्भ में अत्यंत अर्थपूर्ण है। धूल
जीवन की क्षणभंगुरता, विनम्रता और अनुभवों के संचय का प्रतीक
है। जिस प्रकार धूल धीरे-धीरे जम जाती है, उसी प्रकार जीवन
के अनुभव भी मनुष्य के व्यक्तित्व पर अपनी छाप छोड़ते रहते हैं। सुख और दुख दोनों
मिलकर उसकी चेतना का निर्माण करते हैं। कवि इसी सूक्ष्म सत्य की ओर संकेत करता है
कि जीवन की पूर्णता केवल सुख से नहीं, बल्कि उन उदासियों से
भी निर्मित होती है जिन्हें हम सामान्यतः टालना चाहते हैं। इसी क्रम में संग्रह की
एक अन्य अत्यंत उल्लेखनीय कविता ‘दूजा’ मानवीय संबंधों की दार्शनिक व्याख्या प्रस्तुत करती है। कवि लिखता है—
“मेरे
दुख-सुख का आधार
दूजा रहा
फिर वह
दूजा कहाँ रहा!”
(दूजा, पृष्ठ-156)
इन पंक्तियों में प्रेम, आत्मीयता
और संबंधों के गहनतम सत्य को अत्यंत संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली रूप में अभिव्यक्त
किया गया है। सामान्यतः ‘दूजा’ शब्द का अर्थ ‘दूसरा’ अथवा ‘अन्य’ होता है, अर्थात वह जो हमसे पृथक है, जो हमारे अस्तित्व से
बाहर है। किंतु कवि इस शब्द को एक गहरे भावात्मक और दार्शनिक अर्थ में रूपांतरित
करता है। मनुष्य मूलतः संबंधों का प्राणी है। उसका अस्तित्व केवल उसकी व्यक्तिगत
सत्ता तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह अपने प्रियजनों, मित्रों, परिवार और सामाजिक संबंधों के माध्यम से ही
पूर्णता प्राप्त करता है। जीवन में कुछ संबंध ऐसे बनते हैं जो धीरे-धीरे हमारे
सुख-दुख, आशाओं-निराशाओं और स्मृतियों का अभिन्न हिस्सा बन
जाते हैं। तब वे हमारे जीवन के बाहर खड़े व्यक्ति नहीं रहते, बल्कि हमारे अस्तित्व की आंतरिक संरचना का अंग बन जाते हैं। कविता की
पंक्ति— ‘फिर वह दूजा कहाँ रहा!’ —अपने भीतर गहरी भावात्मक ऊष्मा और दार्शनिक गहराई समेटे हुए है। जब कोई
व्यक्ति हमारे दुख-सुख का आधार बन जाता है, तब उसके और हमारे
बीच की सीमाएं धुँधली होने लगती हैं। वह ‘दूसरा’ नहीं रहता; वह
हमारे आत्म का विस्तार बन जाता है। उसके सुख में हमारा सुख और उसके दुख में हमारा
दुख समाहित हो जाता है। यही आत्मीयता का चरम रूप है, जहाँ
‘मैं’ और ‘तुम’ के बीच की दूरी समाप्त होकर एक साझा अस्तित्व का निर्माण करती है। यह
कविता मनुष्य की संबंधपरक सत्ता की कविता है। भारतीय दार्शनिक परंपरा में भी आत्म
और परात्म के बीच की दूरी को समाप्त करने की जो चेतना दिखाई देती है, उसका एक मानवीय और भावनात्मक रूप इस कविता में प्रतिफलित होता है। कवि
यहाँ यह संकेत करता है कि जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि वही संबंध हैं जो हमें अपने
सीमित अहं से बाहर निकालकर किसी दूसरे के साथ गहरे स्तर पर जोड़ते हैं।
समग्रतः ‘अँधेरे दिनों में’ ऐसा कविता-संग्रह है जो अपने समय की जटिलताओं, मनुष्य की आंतरिक विडंबनाओं और सामाजिक संरचनाओं के अंतर्विरोधों को अत्यंत संक्षिप्त किंतु प्रभावशाली भाषा में अभिव्यक्त करता है। यह संग्रह छोटी-बड़ी 98 कविताओं के माध्यम से बड़े जीवन-सत्यों को उद्घाटित करता है। यद्यपि कुछ कविताएं अपनी सपाट कथन-शैली के कारण अपेक्षित कलात्मक ऊँचाई तक नहीं पहुँच पातीं, तथापि संग्रह की अधिकांश कविताएं अपनी दार्शनिक गहराई, प्रतीकात्मकता और अनुभवजन्य प्रामाणिकता के कारण पाठक को लंबे समय तक स्मरण रहती हैं। विनोद अनिकेत की काव्य-दृष्टि का मूल स्वर मनुष्य और उसके अस्तित्व की खोज है। वे अपने समय के अँधेरे को केवल दर्ज नहीं करते, बल्कि उसके भीतर मनुष्य की बची हुई रोशनी को भी तलाशते हैं। उनकी कविताएं पाठक को तैयार निष्कर्ष नहीं देतीं; वे उसे प्रश्नों के बीच छोड़ देती हैं, ताकि वह स्वयं अपने भीतर झांक सके। यही कारण है कि ‘अँधेरे दिनों में’ केवल समकालीन यथार्थ का काव्यात्मक दस्तावेज नहीं बनता, बल्कि आत्ममंथन, आत्मबोध और मानवीय संवेदना की पुनर्खोज का एक महत्त्वपूर्ण साहित्यिक उपक्रम बन जाता है। यही इस संग्रह की सबसे बड़ी उपलब्धि और उसकी स्थायी साहित्यिक सार्थकता है।