खिड़की से झांकता गुलाब (कविता-संग्रह), रचयिता: सरला भारद्वाज
पंजाब हिन्दी साहित्य अकादमी, जालंधर (पंजाब), संस्करण: 2021, मूल्य: 250/-, पृष्ठ: 104
सरला भारद्वाज का कविता-संग्रह ‘खिड़की
से झाँकता गुलाब’ समकालीन हिंदी कविता की एक महत्त्वपूर्ण कृति है, जिसमें
कुल 51 कविताएं संकलित हैं। वर्ष 2021 में
प्रकाशित यह संग्रह कवयित्री की संवेदनशील जीवन-दृष्टि, सामाजिक
चेतना और मानवीय सरोकारों का सशक्त दस्तावेज़ है। इसकी कविताएं माँ की स्मृतियों,
स्त्री-अनुभूति, आत्मसंघर्ष, सामाजिक विसंगतियों, बदलते समय की चुनौतियों तथा
कोविड-19 महामारी से उत्पन्न मानवीय संकट जैसे विविध विषयों
को समेटती हैं। संग्रह की विशेषता इसकी आत्मीय संवेदना और अनुभवों की प्रामाणिकता
है। माँ पर केंद्रित कविताओं में जीवन-मूल्यों और नैतिक आदर्शों की प्रतिष्ठा
दिखाई देती है, जबकि स्त्री-विषयक कविताएं उसके मौन संघर्ष,
धैर्य और संवेदनशीलता को अभिव्यक्त करती हैं। कवयित्री ने आधुनिक
जीवन की मानसिक उलझनों, अकेलेपन और अंतर्द्वंद्व को भी
प्रभावशाली ढंग से चित्रित किया है। कोविड-19 महामारी और
प्रवासी मजदूरों के पलायन से जुड़ी कविताएं अपने समय की ऐतिहासिक त्रासदी का
मार्मिक दस्तावेज़ बन जाती हैं। साथ ही, उपभोक्तावाद,
पर्यावरणीय संकट, शिक्षा के मूल्यहीन स्वरूप
तथा सामाजिक असमानताओं पर भी कवयित्री ने गंभीर चिंतन प्रस्तुत किया है। मुक्तछंद
में लिखी गई इन कविताओं की भाषा सरल, सहज और संप्रेषणीय है।
यद्यपि कुछ कविताओं में सपाट कथन का आभास मिलता है, फिर भी
अधिकांश रचनाएँ अपनी भाव-सघनता, संवेदनात्मक गहराई और
जीवन-सापेक्ष दृष्टि के कारण पाठक पर स्थायी प्रभाव छोड़ती हैं। यह संग्रह मानवीय
संवेदना और जीवन-संघर्ष का एक महत्त्वपूर्ण काव्य-दस्तावेज़ है।
‘खिड़की से झांकता गुलाब’ जीवन की विविध
अनुभूतियों, मानवीय संवेदनाओं और सामाजिक यथार्थ का ऐसा काव्य-संग्रह है,
जिसमें व्यक्तिगत स्मृतियाँ और सामूहिक अनुभव एक-दूसरे में घुल-मिल
जाते हैं। संग्रह की इक्यावन कविताएं मिलकर समकालीन जीवन का एक बहुरंगी, बहुआयामी और संवेदनशील चित्र निर्मित करती हैं। यह कृति पाठक को केवल
भाव-विभोर नहीं करती, बल्कि उसे अपने समय, समाज और स्वयं के भीतर झाँकने की दृष्टि भी प्रदान करती है। इसी कारण यह
संग्रह समकालीन हिंदी कविता की उन उल्लेखनीय कृतियों में स्थान पाने का अधिकारी है,
जिनमें जीवन की साधारण घटनाएँ भी गहन मानवीय अर्थों से अनुप्राणित
होकर एक स्थायी साहित्यिक मूल्य अर्जित कर लेती हैं। संग्रह ‘खिड़की से झांकता गुलाब’ की सबसे उल्लेखनीय
विशेषता इसकी व्यापक विषय-विविधता है। कवयित्री सरला भारद्वाज ने अपने काव्य-संसार
को किसी एक भावभूमि अथवा विचार-परिसर तक सीमित नहीं रखा है, बल्कि
व्यक्तिगत अनुभवों, पारिवारिक स्मृतियों, सामाजिक यथार्थ, मानवीय मूल्यों और समकालीन जीवन की
जटिलताओं को अपनी रचनाओं का आधार बनाया है। यही कारण है कि संग्रह की कविताएं एक
ओर आत्मीय और निजी अनुभूतियों से अनुप्राणित दिखाई देती हैं, तो दूसरी ओर वे व्यापक मानवीय सरोकारों और सामाजिक चेतना का प्रतिनिधित्व
भी करती हैं। कवयित्री के लिए कविता केवल भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं,
बल्कि जीवन को समझने, परखने और उसके भीतर
निहित मानवीय मूल्यों की खोज का एक सशक्त साधन बन जाती है।
संग्रह में विशेष रूप से माँ की स्मृतियों
पर आधारित कविताएं अपनी भावात्मक गरिमा और आत्मीयता के कारण पाठक का ध्यान आकर्षित
करती हैं। इन कविताओं में माँ केवल स्मरण का विषय नहीं हैं, बल्कि
वे जीवन-दर्शन, नैतिकता और मानवीय मूल्यों की जीवंत प्रतीक
बनकर उपस्थित होती हैं। कवयित्री के मानस में माँ की छवि एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप
में अंकित है, जिसने जीवन को परोपकार, संवेदना
और निस्वार्थ कर्म की दृष्टि से देखने की प्रेरणा दी। ‘माँ
सच कहती थी’ कविता में यह भाव अत्यंत प्रभावशाली रूप में
व्यक्त हुआ है—
“वे लोग हैं
धरा का शृंगार
जो ढोल नहीं पीटते
संवेदना को सींचते
संवारते रहते हैं
चुपचाप
अपना आसपास।”
(माँ सच कहती थी, पृ. 13)
इन पंक्तियों में कवयित्री उन व्यक्तियों के
प्रति सम्मान प्रकट करती हैं, जो बिना किसी प्रदर्शन या यश-लिप्सा के
समाज और मानवता की सेवा में संलग्न रहते हैं। यहाँ ‘धरा का
शृंगार’ एक अत्यंत अर्थगर्भित बिंब है, जो यह संकेत देता है कि संसार की वास्तविक सुंदरता उन लोगों से निर्मित
होती है जो अपने कर्मों द्वारा संवेदनाओं को जीवित रखते हैं। कवयित्री के अनुसार
मानवीय करुणा, सहानुभूति और परोपकार ही जीवन के वास्तविक
मूल्य हैं, जो समाज को मानवीय बनाए रखते हैं। इसी कविता में
आगे माँ के जीवन-दर्शन को और अधिक स्पष्टता के साथ अभिव्यक्त किया गया है—
“माँ सच कहती थी
सर्वजनहिताय
स्वयं को समर्पित
करने वालों की कमी नहीं है
तभी तो दुनिया चल रही है।”
(माँ सच कहती थी, पृ. 15)
इन पंक्तियों में माँ का व्यक्तित्व एक
नैतिक मार्गदर्शक के रूप में उभरता है। कवयित्री के लिए माँ की स्मृति केवल
भावुकता का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन के सकारात्मक पक्षों में विश्वास बनाए रखने की
प्रेरणा है। वर्तमान समय में जब स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा और
भौतिकता की प्रवृत्तियाँ तीव्र होती जा रही हैं, तब ये
पंक्तियाँ मनुष्य के भीतर निहित सद्भावना और परमार्थ की शक्ति पर विश्वास व्यक्त
करती हैं। यहाँ कवयित्री जीवन के प्रति एक आशावादी दृष्टिकोण प्रस्तुत करती हैं,
जो संग्रह की मानवीय चेतना को और अधिक गहराई प्रदान करता है।
संग्रह की आरंभिक कविता ‘स्त्रियां’ स्त्री-अनुभूति
की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह कविता स्त्री के बाह्य जीवन से अधिक उसके
अंतर्मन की उन अनकही स्थितियों को अभिव्यक्त करती है, जिन्हें
समाज प्रायः अनदेखा कर देता है। कवयित्री स्त्री को किसी संघर्षशील नारे या
वैचारिक प्रतिरोध के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत नहीं करतीं, बल्कि उसके मौन धैर्य, सहनशीलता और आंतरिक शक्ति को
रेखांकित करती हैं—
“किसी को
कानों-कान
ख़बर तक नहीं होने देती
बहुत से झंझावातों को
खामोशी से
झेल जाती हैं
सचमुच
स्त्रियां बड़ी अजीब होती हैं।”
(स्त्रियां, पृ. 6)
इन पंक्तियों में स्त्री-जीवन की वह त्रासदी
और महिमा दोनों एक साथ अभिव्यक्त हुई हैं, जो भारतीय सामाजिक संरचना का एक यथार्थ
पक्ष है। “खामोशी से झेल जाती हैं” जैसे शब्द-समूह स्त्री के भीतर छिपी उस असाधारण
सहनशक्ति की ओर संकेत करते हैं, जिसके बल पर वह जीवन के अनेक
संघर्षों और विषमताओं का सामना करती है। कवयित्री ने स्त्री की पीड़ा को करुणा के
स्तर पर प्रस्तुत करने के साथ-साथ उसकी अंतर्निहित शक्ति को भी रेखांकित किया है। यहाँ
स्त्री का चित्रण किसी विद्रोही उद्घोषणा या प्रत्यक्ष प्रतिरोध के रूप में नहीं,
बल्कि उसकी आंतरिक दृढ़ता, धैर्य और आत्मबल की
पहचान के रूप में सामने आता है। कविता यह संकेत देती है कि स्त्री का जीवन अनेक
ऐसे अनुभवों और संघर्षों से भरा होता है, जिनकी जानकारी समाज
को शायद ही कभी हो पाती है। वह अपने भीतर के तूफानों को स्वयं सहती है और अपने
दायित्वों का निर्वाह करती रहती है। इस प्रकार कवयित्री स्त्री-अस्तित्व की उस मौन
व्यथा को स्वर देती हैं, जो प्रायः सामाजिक संबंधों और
पारिवारिक संरचनाओं के भीतर दबकर रह जाती है। वस्तुतः माँ की स्मृतियों और
स्त्री-अनुभूति से संबंधित ये कविताएं संग्रह की संवेदनात्मक शक्ति का आधार हैं।
इनमें एक ओर जीवन-मूल्यों की प्रतिष्ठा है, तो दूसरी ओर
मानवीय संबंधों की आत्मीयता और भावात्मक ऊष्मा भी विद्यमान है। सरला भारद्वाज की
विशेषता यह है कि वे सामान्य जीवनानुभवों को भी ऐसी मार्मिकता और सहजता के साथ
प्रस्तुत करती हैं कि वे व्यक्तिगत अनुभव की सीमाओं का अतिक्रमण कर सार्वभौमिक
मानवीय अनुभूति का रूप ग्रहण कर लेते हैं। यही गुण ‘खिड़की
से झांकता गुलाब’ को एक संवेदनशील, मानवीय और विचारोत्तेजक काव्य-संग्रह के रूप में स्थापित करता है।
‘खिड़की से झांकता गुलाब’ की एक
महत्त्वपूर्ण विशेषता यह है कि इसकी अनेक कविताएं मनुष्य के अंतर्जगत में घटित
होने वाले सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक द्वंद्वों, आत्ममंथन और मानसिक जटिलताओं को अत्यंत
सहजता और संवेदनात्मक गहराई के साथ अभिव्यक्त करती हैं। सरला भारद्वाज की कविताएं
बाह्य जीवन के दृश्यों और घटनाओं का मात्र चित्रण नहीं करतीं, बल्कि वे मनुष्य के भीतर चल रही उन अदृश्य प्रक्रियाओं को भी स्वर देती
हैं, जिनसे उसका व्यक्तित्व, चिंतन और
व्यवहार निर्मित होता है। कवयित्री के लिए मन केवल भावनाओं का केंद्र नहीं है,
बल्कि वह एक ऐसा रहस्यमय क्षेत्र है जहाँ विचार, स्मृतियाँ, आशंकाएँ, आकांक्षाएँ
और संघर्ष निरंतर सक्रिय रहते हैं। यही कारण है कि उनकी अनेक कविताएं आत्मसंवाद और
आत्मविश्लेषण की प्रक्रिया से होकर गुजरती हैं। ‘कशमकश’ कविता इसी मनोवैज्ञानिक धरातल पर रची गई एक महत्त्वपूर्ण रचना है।
कवयित्री लिखती हैं—
“जब भी
मन
किसी विषय पर कशमकश से गुजरता है
आसपास के
परिवेश से
निर्लिप्त हो जाता है।”
(कशमकश, पृ. 10)
इन संक्षिप्त किंतु सारगर्भित पंक्तियों में
मनुष्य की मानसिक अवस्था का अत्यंत सटीक और स्वाभाविक चित्र उपस्थित हुआ है। जब मन
किसी द्वंद्व, असमंजस या गहन विचार-प्रक्रिया में उलझ जाता है, तब उसका ध्यान बाहरी संसार से हटकर भीतर की ओर केंद्रित हो जाता है।
कवयित्री ने इस सामान्य किंतु गहन अनुभव को अत्यंत सहज भाषा में अभिव्यक्त किया
है। यहाँ ‘निर्लिप्त हो जाता है’ केवल
एक मनःस्थिति का संकेत नहीं, बल्कि उस आत्ममंथन की प्रक्रिया
का प्रतीक है जिसमें व्यक्ति स्वयं से संवाद करने लगता है। कविता इस तथ्य को
रेखांकित करती है कि जीवन के अनेक निर्णायक क्षणों में मनुष्य को बाहरी संसार से
अधिक अपने अंतर्मन का सामना करना पड़ता है। इस प्रकार यह कविता आधुनिक मनुष्य की
मानसिक जटिलताओं और उसके भीतर चलने वाले संघर्षों का सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक चित्र
प्रस्तुत करती है।
इसी प्रकार ‘मन है कि मानता नहीं’ कविता में कवयित्री ने
मन की चंचलता, उसकी स्वायत्त सत्ता और उसके अनियंत्रित वेग को अभिव्यक्ति दी
है। कविता की पंक्तियाँ हैं—
“मैं चाहती हूँ
मन को बाँधना
अपने अनुसार
मगर
इसके अजेय वेग के समक्ष
स्वयं को पाती हूँ
लाचार।”
(मन है कि मानता नहीं, पृ. 87)
यहाँ मनुष्य और मन के बीच का द्वंद्व अत्यंत
मार्मिक रूप में व्यक्त हुआ है। मनुष्य अपनी इच्छाओं, विवेक
और सामाजिक दायित्वों के अनुरूप मन को नियंत्रित करना चाहता है, किंतु मन की अपनी स्वतंत्र गति और प्रवृत्ति होती है। ‘अजेय वेग’ शब्द-युग्म मन की उस अप्रतिहत शक्ति को
अभिव्यक्त करता है, जिसके समक्ष मनुष्य अनेक बार स्वयं को
असहाय अनुभव करता है। कविता यह संकेत देती है कि मनुष्य का सबसे कठिन संघर्ष बाहरी
परिस्थितियों से नहीं, बल्कि अपने ही मन से होता है। यह
मनोवैज्ञानिक सत्य कविता को दार्शनिक गहराई प्रदान करता है। कवयित्री ने अत्यंत
सरल शब्दों में मनुष्य की उस सार्वभौमिक अनुभूति को अभिव्यक्त किया है, जिससे प्रत्येक संवेदनशील व्यक्ति कभी न कभी गुजरता है। इन दोनों कविताओं
में मनोवैज्ञानिक यथार्थ का अत्यंत सूक्ष्म और प्रभावशाली चित्रण मिलता है।
कवयित्री किसी जटिल दार्शनिक विमर्श का सहारा नहीं लेतीं, बल्कि
जीवन के सामान्य अनुभवों के माध्यम से मनुष्य के अंतर्जगत की गहन परतों को
उद्घाटित करती हैं। यही कारण है कि ये कविताएं पाठक के भीतर आत्मचिंतन की
प्रक्रिया को सक्रिय करती हैं और उसे अपने ही अनुभवों से जोड़ देती हैं।
संग्रह का एक अन्य अत्यंत महत्त्वपूर्ण पक्ष
कोविड-19 महामारी से उपजा भाव-बोध और सामाजिक यथार्थ है। वर्ष 2020-21 के दौरान पूरी दुनिया ने जिस अभूतपूर्व संकट का सामना किया, उसने केवल मानव-स्वास्थ्य को ही प्रभावित नहीं किया, बल्कि सामाजिक संरचनाओं, आर्थिक व्यवस्थाओं और
मानवीय संबंधों को भी गहराई से झकझोर दिया। सरला भारद्वाज ने इस वैश्विक त्रासदी
को केवल एक घटना के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसके भीतर छिपी
मानवीय पीड़ा, असुरक्षा और विस्थापन की अनुभूतियों को अपनी
कविताओं का विषय बनाया है। ‘पलायन’ कविता इसी संदर्भ में विशेष रूप से उल्लेखनीय है। महामारी के दौरान लाखों
प्रवासी मजदूरों के अपने गाँवों की ओर लौटने का दृश्य भारतीय समाज की सबसे मार्मिक
और त्रासद घटनाओं में से एक था। कवयित्री ने इस मानवीय संकट को अत्यंत संवेदनात्मक
दृष्टि से देखा है—
“लोगों की भीड़ निरंतर बढ़ रही है
उनके लिए ‘जाना’ भयावह शब्द नहीं है
संक्रमण और भूख से मरने की अपेक्षा
हर भाषा, वेशभूषा, धर्म
और देश-परदेश के लोग
चले जा रहे हैं
अपने-अपने गाँवों की ओर।”
(पलायन, पृ. 28)
इन पंक्तियों में महामारी के समय उत्पन्न भय, असुरक्षा
और विवशता का अत्यंत यथार्थपरक चित्र उपस्थित हुआ है। ‘संक्रमण
और भूख से मरने की अपेक्षा’ जैसी अभिव्यक्ति उस कठोर
वास्तविकता को उद्घाटित करती है, जिसमें जीवन और मृत्यु के
बीच संघर्ष कर रहा व्यक्ति अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए लंबी और कष्टदायक
यात्राएँ करने को बाध्य था। कवयित्री यहाँ केवल दृश्य का वर्णन नहीं करतीं,
बल्कि उस सामूहिक पीड़ा को स्वर देती हैं जिसे लाखों लोगों ने
प्रत्यक्ष रूप से अनुभव किया। कविता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष इसकी मानवीय दृष्टि
है। कवयित्री यह रेखांकित करती हैं कि संकट की इस घड़ी में भाषा, धर्म, वेशभूषा और क्षेत्रीय भेद गौण हो गए थे। सभी
लोग समान रूप से भय, भूख और असुरक्षा से जूझ रहे थे। इस
प्रकार कविता मानव अस्तित्व की उस सार्वभौमिकता को भी उद्घाटित करती है, जो विपत्ति के समय सभी विभाजनों को अप्रासंगिक बना देती है। वस्तुतः ‘पलायन’ केवल कोविड-19 महामारी
का वर्णन करने वाली कविता नहीं है, बल्कि वह हमारे समय के
सामाजिक इतिहास का एक संवेदनशील दस्तावेज़ बन जाती है। इसमें व्यवस्था की सीमाएँ,
आर्थिक विषमताएँ और आम मनुष्य की विवशता अप्रत्यक्ष रूप से उभरकर
सामने आती हैं। कवयित्री ने किसी प्रत्यक्ष राजनीतिक टिप्पणी के स्थान पर मानवीय
संवेदना को केंद्र में रखा है, जिसके कारण कविता का प्रभाव
और अधिक व्यापक तथा स्थायी बन जाता है। इस प्रकार ‘कशमकश’,
‘मन है कि मानता नहीं’ और ‘पलायन’ जैसी कविताएं संग्रह के उस महत्त्वपूर्ण
पक्ष को उद्घाटित करती हैं, जहाँ व्यक्तिगत मनःस्थितियाँ और
सामाजिक यथार्थ एक-दूसरे से जुड़ते हुए दिखाई देते हैं। एक ओर कवयित्री मनुष्य के
अंतर्मन में चल रहे सूक्ष्म संघर्षों को स्वर देती हैं, तो
दूसरी ओर अपने समय की सामूहिक पीड़ाओं को भी संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त करती
हैं। यही संतुलन ‘खिड़की से झांकता गुलाब’ को केवल भावप्रधान काव्य-संग्रह न बनाकर एक महत्त्वपूर्ण मानवीय और
सामाजिक काव्य-दस्तावेज़ के रूप में प्रतिष्ठित करता है।
‘खिड़की से झांकता गुलाब’ की कविताएं
केवल निजी अनुभूतियों और आत्मसंवाद तक सीमित नहीं हैं, बल्कि
वे समकालीन समाज की विसंगतियों, विडंबनाओं और मूल्य-संकटों
पर भी गंभीर दृष्टि डालती हैं। सरला भारद्वाज का काव्य-बोध जीवन और समाज से गहरे
स्तर पर जुड़ा हुआ है। वे अपने समय की सामाजिक, सांस्कृतिक
और नैतिक चुनौतियों को संवेदनशील मन से देखती हैं और उन्हें कविता के माध्यम से
अभिव्यक्ति प्रदान करती हैं। उनकी कविताओं में प्रत्यक्ष आक्रोश या वैचारिक
आक्रामकता की अपेक्षा चिंतनशीलता और मानवीय सरोकारों की गहरी उपस्थिति दिखाई देती
है। यही कारण है कि उनकी सामाजिक चेतना उपदेशात्मक न होकर अनुभवजन्य और आत्मसात
प्रतीत होती है। समकालीन सभ्यता का एक प्रमुख संकट अनियंत्रित शहरीकरण और
उपभोक्तावादी मानसिकता है, जिसने प्रकृति और मनुष्य दोनों के
अस्तित्व को संकटग्रस्त कर दिया है। कवयित्री इस विडंबना को अत्यंत संक्षिप्त
किंतु प्रभावपूर्ण शब्दों में व्यक्त करती हैं। ‘आदमी की
भूख’ कविता की पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं—
“हर तरफ
उग आए हैं
कंकरीट के जंगल
जो आदमी की भूख की
निशानियाँ हैं।”
(आदमी की भूख, पृ. 40)
इन पंक्तियों में ‘कंकरीट
के जंगल’ एक अत्यंत सशक्त प्रतीक के रूप में प्रयुक्त हुआ
है। यह प्रतीक केवल बहुमंज़िला इमारतों और विस्तृत महानगरों की ओर संकेत नहीं करता,
बल्कि उस असीमित भौतिक लालसा का भी प्रतिनिधित्व करता है जिसने
प्रकृति की हरित चेतना को निगल लिया है। कवयित्री के अनुसार आधुनिक विकास का यह
मॉडल मनुष्य की आवश्यकताओं से अधिक उसकी अतृप्त इच्छाओं और उपभोग की प्रवृत्ति का
परिणाम है। यहाँ ‘आदमी की भूख’ केवल
शारीरिक भूख नहीं, बल्कि धन, संपत्ति,
सत्ता और विस्तार की उस मानसिकता का रूपक है जो निरंतर अधिक पाने की
आकांक्षा से प्रेरित है। कविता की विशेषता यह है कि वह पर्यावरणीय संकट और मानवीय
लोभ को एक-दूसरे से जोड़ते हुए देखती है। आज जहाँ वृक्षों, खेतों
और प्राकृतिक संसाधनों का स्थान धीरे-धीरे कंकरीट के विस्तार ने ले लिया है,
वहाँ यह कविता आधुनिक विकास की अवधारणा पर एक गंभीर प्रश्नचिह्न
लगाती है। सरला भारद्वाज इस परिवर्तन को केवल भौतिक परिदृश्य का परिवर्तन नहीं
मानतीं, बल्कि इसे मनुष्य की संवेदनात्मक और नैतिक क्षति के
रूप में भी देखती हैं। इस प्रकार कविता अपने संक्षिप्त आकार में एक व्यापक सामाजिक
और पर्यावरणीय विमर्श को समाहित कर लेती है। इसी प्रकार ‘होनहार
कलाकार की आत्महत्या’ कविता समकालीन शिक्षा-व्यवस्था के
मूल्यहीन स्वरूप और उसकी उपयोगितावादी प्रवृत्ति पर प्रश्न उठाती है। कवयित्री
लिखती हैं—
“क्यों
शिक्षा मात्र पढ़ाती है
स्वालंबन का पाठ
उड़ाती है
नैतिक मूल्यों का उपहास?”
(होनहार कलाकार की आत्महत्या, पृ. 72)
ये पंक्तियाँ वर्तमान शिक्षा-प्रणाली की एक
गंभीर विडंबना की ओर संकेत करती हैं। आधुनिक शिक्षा मनुष्य को आर्थिक रूप से सक्षम
और आत्मनिर्भर बनने की शिक्षा तो देती है, किंतु उसके भीतर मानवीय मूल्यों, संवेदनाओं और नैतिक चेतना का विकास किस सीमा तक कर पाती है—यह एक
महत्त्वपूर्ण प्रश्न है। कवयित्री का यह प्रश्न केवल शिक्षा-व्यवस्था तक सीमित
नहीं है, बल्कि समूचे समाज की उस मानसिकता पर भी टिप्पणी
करता है जहाँ सफलता का मूल्यांकन प्रायः आर्थिक उपलब्धियों और प्रतिस्पर्धात्मक
दक्षताओं के आधार पर किया जाता है। ‘होनहार कलाकार की
आत्महत्या’ शीर्षक स्वयं इस बात की ओर संकेत करता है कि
प्रतिभा, संवेदना और रचनात्मकता से सम्पन्न व्यक्ति भी उस
व्यवस्था में स्वयं को असहाय अनुभव कर सकता है, जहाँ मानवीय
मूल्यों की अपेक्षा भौतिक उपलब्धियों को अधिक महत्त्व दिया जाता है। कविता शिक्षा
और जीवन के बीच उत्पन्न उस अंतराल को उजागर करती है, जहाँ
ज्ञान का विस्तार तो होता है, किंतु मनुष्यत्व का विकास पीछे
छूट जाता है। इस प्रकार यह कविता समकालीन समाज की नैतिक विडंबना पर एक मार्मिक और
विचारोत्तेजक टिप्पणी बन जाती है। इन दोनों कविताओं में कवयित्री का सामाजिक
सरोकार स्पष्ट रूप से परिलक्षित होता है। वे अपने समय की समस्याओं को केवल बाहरी
घटनाओं के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि उनके पीछे सक्रिय
मानसिकताओं, प्रवृत्तियों और मूल्य-संकटों को भी पहचानती
हैं। उनकी कविताएं सामाजिक यथार्थ का चित्रण करते हुए पाठक को आत्मचिंतन की दिशा
में प्रेरित करती हैं।
संग्रह का एक अन्य महत्त्वपूर्ण पक्ष
समय-बोध और परिवर्तन-चेतना है। जीवन निरंतर परिवर्तनशील है; परिस्थितियाँ
बदलती हैं, संबंध बदलते हैं, जीवन-मूल्य
बदलते हैं और समय के साथ मनुष्य की जीवन-शैली भी परिवर्तित होती रहती है। किंतु इन
परिवर्तनों को स्वीकार करना मनुष्य के लिए सदैव सहज नहीं होता। सरला भारद्वाज ने
इस मानवीय मनोविज्ञान को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ अभिव्यक्त किया है। ‘समय के साथ’ कविता में वे लिखती हैं—
“बदलते समय के साथ
बदल जाता है
जीवन का संदर्भ
जीने का रंग-ढंग
मगर मेरा मन
अक्सर
स्वीकार नहीं कर पाता
परिवर्तन।”
(समय के साथ, पृ. 19)
इन पंक्तियों में आधुनिक जीवन की एक
सार्वभौमिक अनुभूति अभिव्यक्त हुई है। कवयित्री स्वीकार करती हैं कि परिवर्तन जीवन
का अनिवार्य सत्य है; समय के साथ जीवन के संदर्भ, प्राथमिकताएँ
और व्यवहार बदलते रहते हैं। फिर भी मनुष्य का मन अतीत से जुड़ा रहता है और वह अनेक
बार नए परिवर्तनों को सहजता से स्वीकार नहीं कर पाता। यही द्वंद्व इस कविता का
केंद्रीय भाव है। यहाँ कवयित्री का स्वर केवल व्यक्तिगत नहीं रह जाता, बल्कि वह समस्त मानव-समुदाय की संवेदना का प्रतिनिधित्व करने लगता है।
प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में किसी न किसी स्तर पर इस अनुभव से गुजरता है कि
बदलती परिस्थितियाँ उसे नए ढंग से सोचने और जीने के लिए बाध्य करती हैं, जबकि उसका मन पुरानी स्मृतियों, संबंधों और मूल्यों
से जुड़ा रहता है। कविता इसी मानसिक दुविधा को अत्यंत सरल किंतु प्रभावशाली शब्दों
में अभिव्यक्त करती है। दार्शनिक दृष्टि से भी यह कविता महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि यह समय और मनुष्य के संबंध को रेखांकित करती है। समय परिवर्तन का
वाहक है, जबकि मन स्थायित्व की आकांक्षा रखता है। इन दोनों
के मध्य उत्पन्न तनाव ही मनुष्य के अनेक मानसिक संघर्षों का कारण बनता है।
कवयित्री ने इस गहन जीवन-सत्य को बिना किसी जटिल दार्शनिक भाषा के अत्यंत सहज और
आत्मीय रूप में प्रस्तुत किया है। वस्तुतः ‘आदमी की भूख’,
‘होनहार कलाकार की आत्महत्या’ और ‘समय के साथ’ जैसी कविताएं यह प्रमाणित करती हैं
कि सरला भारद्वाज का काव्य केवल भावुक स्मृतियों और निजी अनुभूतियों तक सीमित नहीं
है। उसमें समकालीन समाज की विडंबनाओं के प्रति सजग दृष्टि, नैतिक
मूल्यों के क्षरण के प्रति चिंता, पर्यावरणीय संकट के प्रति
संवेदनशीलता तथा बदलते समय के प्रति गहन आत्मचिंतन विद्यमान है। यही सामाजिक चेतना
और समय-बोध उनके काव्य को व्यापक मानवीय संदर्भ प्रदान करते हैं तथा ‘खिड़की से झांकता गुलाब’ को एक विचारोत्तेजक और
सार्थक काव्य-संग्रह के रूप में स्थापित करते हैं।
सरला भारद्वाज के कविता-संग्रह ‘खिड़की
से झांकता गुलाब’ का मूल्यांकन करते समय यह स्पष्ट रूप से अनुभव किया जा
सकता है कि इसकी वास्तविक शक्ति किसी जटिल शिल्प-विधान, चमत्कारपूर्ण
भाषा या बिंबों और प्रतीकों की बहुलता में नहीं, बल्कि
अनुभवों की प्रामाणिकता और संवेदनाओं की आत्मीय अभिव्यक्ति में निहित है। संग्रह
की अधिकांश कविताएं मुक्तछंद में लिखी गई हैं, जो समकालीन
हिंदी कविता की उस परंपरा से जुड़ती हैं जहाँ भावों और विचारों की स्वाभाविक
अभिव्यक्ति को छंदगत अनुशासन से अधिक महत्त्व दिया जाता है। मुक्तछंद का प्रयोग
कवयित्री को अपने अनुभवों को बिना किसी औपचारिक बंधन के प्रस्तुत करने की
स्वतंत्रता प्रदान करता है, जिससे उनकी अभिव्यक्ति अधिक सहज,
स्वाभाविक और आत्मीय बन जाती है। भाषा की दृष्टि से यह संग्रह विशेष
रूप से उल्लेखनीय है। कवयित्री ने ऐसी भाषा का चयन किया है जो न तो कृत्रिम
अलंकरणों से बोझिल है और न ही बौद्धिक जटिलताओं से युक्त। उनकी भाषा बोलचाल की
सहजता, आत्मीयता और संप्रेषणीयता से सम्पन्न है। वे शब्दों
के वैभव की अपेक्षा भावों की सच्चाई पर अधिक विश्वास करती हैं। यही कारण है कि
उनकी कविताएं पाठक तक बिना किसी अवरोध के पहुँचती हैं और उसके अनुभव-जगत का हिस्सा
बन जाती हैं। उनकी काव्य-भाषा में एक प्रकार की आत्मीय संवादधर्मिता दिखाई देती है,
मानो कवयित्री पाठक से प्रत्यक्ष संवाद कर रही हों। निस्संदेह,
कुछ कविताओं में यह सरलता सपाट बयानी का आभास कराती है। कहीं-कहीं
ऐसा प्रतीत होता है कि कविता और गद्य के बीच की दूरी अत्यंत कम हो गई है। किंतु यह
भी उतना ही सत्य है कि अधिकांश रचनाओं में अनुभूति की सघनता और भावों की
प्रामाणिकता इस सपाटता को प्रभावशीलता में रूपांतरित कर देती है। कवयित्री के लिए
कविता का उद्देश्य शब्दों का चमत्कार रचना नहीं, बल्कि
जीवन-सत्य को उसकी वास्तविक संवेदनात्मक ऊष्मा के साथ प्रस्तुत करना है। यही कारण
है कि उनकी कविताएं पढ़ते समय पाठक को अलंकारिक सौंदर्य से अधिक जीवन की सच्चाइयों
का साक्षात्कार होता है। यद्यपि कवयित्री प्रतीकों और रूपकों का अत्यधिक प्रयोग
नहीं करतीं, तथापि जहाँ उनका प्रयोग हुआ है, वहाँ वे अत्यंत सार्थक और अर्थगर्भित बन पड़े हैं। ‘लगभग डूबते हुए’ कविता इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण
है—
“लगता है
लहरों के साथ बह जाना
अब मेरी नियति है।”
(लगभग डूबते हुए, पृ. 48)
इन पंक्तियों में ‘लहरें’ केवल प्राकृतिक दृश्य का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि वे
जीवन की उन अनिश्चित परिस्थितियों, संघर्षों और बाधाओं का
प्रतीक बन जाती हैं, जिनके समक्ष व्यक्ति अनेक बार स्वयं को
असहाय अनुभव करता है। यहाँ ‘बह जाना’
नियति के प्रति समर्पण, थकान और अस्तित्वगत विवशता की
मनःस्थिति को व्यक्त करता है। कविता का आकार छोटा है, किंतु
उसका भाव-संसार अत्यंत व्यापक है। यह मनुष्य के उस आंतरिक क्षण को अभिव्यक्त करती
है जब परिस्थितियाँ उसकी इच्छाशक्ति से अधिक प्रबल प्रतीत होने लगती हैं। इसी
प्रकार ‘ज़िंदगी एक पुस्तक’ कविता
में जीवन को पुस्तक के रूपक के माध्यम से प्रस्तुत किया गया है—
“क्या ज़िंदगी से भी बढ़कर
कोई और पुस्तक है
जिसका
एक-एक
मधुर व कड़वा अनुभव
अपने में एक पूरी कविता है।”
(ज़िंदगी एक पुस्तक, पृ. 90)
यहाँ जीवन को पुस्तक के रूप में देखना केवल
एक साहित्यिक रूपक नहीं है, बल्कि एक गहन दार्शनिक दृष्टि का परिचायक
है। कवयित्री का विश्वास है कि जीवन स्वयं सबसे बड़ा विश्वविद्यालय और सबसे
प्रामाणिक ग्रंथ है। उसके प्रत्येक अनुभव में एक नई सीख, एक
नई संवेदना और एक नया अर्थ छिपा होता है। सुख और दुःख, सफलता
और असफलता, आशा और निराशा—ये सभी जीवन-पुस्तक के ऐसे अध्याय
हैं, जो मनुष्य के व्यक्तित्व को गढ़ते हैं। ‘एक पूरी कविता’ का प्रयोग इस तथ्य को रेखांकित करता
है कि जीवन का प्रत्येक अनुभव अपने भीतर एक स्वतंत्र कथा और संवेदना का संसार
समेटे हुए है। यह रूपक संग्रह की दार्शनिक चेतना और जीवन-दृष्टि को अत्यंत प्रभावी
ढंग से उद्घाटित करता है।
संग्रह की एक अन्य महत्त्वपूर्ण विशेषता
उसकी संघर्षधर्मी और सकारात्मक जीवन-दृष्टि है। सरला भारद्वाज जीवन को निष्क्रिय
स्वीकार्यता के रूप में नहीं देखतीं, बल्कि संघर्ष, कर्म
और आत्मविश्वास के रूप में परिभाषित करती हैं। उनकी दृष्टि में जीवन का अर्थ
चुनौतियों से बचना नहीं, बल्कि उनका सामना करना है। ‘स्वयं मृगेन्द्र बनें’ कविता में यह विचार
अत्यंत प्रेरणादायक स्वर में व्यक्त हुआ है—
“जीने के लिए
संघर्ष करना पड़ता है
निरंतर
अँधेरों के खिलाफ
जलाना पड़ता है
स्वयं को
शोषण-अन्याय की
दहकती आग में
समिधा की तरह।”
(स्वयं मृगेन्द्र बनें, पृ. 101)
इन पंक्तियों में कवयित्री ने जीवन को एक
सतत संघर्ष-यात्रा के रूप में चित्रित किया है। ‘अँधेरे’ यहाँ केवल भौतिक अंधकार नहीं, बल्कि अन्याय,
शोषण, अज्ञान, विषमता और
निराशा के प्रतीक हैं। इनके विरुद्ध संघर्ष करना ही मनुष्य की नैतिक जिम्मेदारी
है। ‘समिधा’ का बिंब विशेष रूप से
उल्लेखनीय है। यज्ञ में समिधा स्वयं जलकर प्रकाश और ऊर्जा उत्पन्न करती है;
उसी प्रकार मनुष्य को भी समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाने के लिए
त्याग और संघर्ष का मार्ग अपनाना पड़ता है। यह कविता आत्मबल, कर्मशीलता और सामाजिक उत्तरदायित्व की भावना को सुदृढ़ करती है तथा संग्रह
की प्रेरणात्मक चेतना का प्रतिनिधित्व करती है।
यदि काव्य-तत्त्वों की दृष्टि से इस संग्रह का मूल्यांकन किया जाए, तो इसका भाव-पक्ष सर्वाधिक सशक्त दिखाई देता है। कविताओं में अनुभूति की प्रामाणिकता, संवेदना की ऊष्मा और जीवनानुभवों की सच्चाई पाठक को गहरे स्तर पर प्रभावित करती है। कवयित्री का अनुभव-संसार व्यापक है और वे उसे बिना किसी कृत्रिमता के अभिव्यक्त करने में सफल रही हैं। यही कारण है कि उनकी कविताएं पाठक के हृदय तक सीधे पहुँचती हैं। विचार-तत्त्व भी संग्रह में पर्याप्त रूप से उपस्थित है। विशेषतः सामाजिक विषमताओं, नैतिक मूल्यों के ह्रास, स्त्री-अस्तित्व, पर्यावरणीय संकट, शिक्षा-व्यवस्था और कोविड-19 जैसी परिस्थितियों से संबंधित कविताओं में कवयित्री की चिंतनशील दृष्टि स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। वे केवल भावुकता तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि अपने समय के प्रश्नों से संवाद भी स्थापित करती हैं। कल्पना-तत्त्व अपेक्षाकृत सीमित है। इसका कारण यह नहीं कि कवयित्री में कल्पनाशीलता का अभाव है, बल्कि इसलिए कि उनका रचनात्मक आग्रह यथार्थ और अनुभव पर अधिक केंद्रित है। वे कल्पना के आकाश में विचरण करने की अपेक्षा जीवन की धरती पर खड़े होकर कविता रचती हैं। परिणामस्वरूप उनकी कविताओं में यथार्थ की ठोस उपस्थिति और अनुभव की विश्वसनीयता बनी रहती है। शिल्प-पक्ष की दृष्टि से संग्रह सरल, सहज और स्वाभाविक है। मुक्तछंद का प्रयोग अभिव्यक्ति को स्वच्छंदता प्रदान करता है। भाषा में बोलचाल की सादगी है, जिससे कविता और पाठक के बीच कोई दूरी नहीं रह जाती। यद्यपि कहीं-कहीं शिल्पगत कसावट और प्रतीकात्मक गहराई की अपेक्षा की जा सकती है, फिर भी समग्र रूप से यह सरलता ही संग्रह की सबसे बड़ी शक्ति बनकर उभरती है। इस प्रकार ‘खिड़की से झांकता गुलाब’ केवल इक्यावन कविताओं का संकलन नहीं, बल्कि समकालीन जीवन, मानवीय संवेदना और संघर्षशील चेतना का एक महत्त्वपूर्ण काव्य-दस्तावेज है, जो हिंदी कविता की संवेदनशील परंपरा को समृद्ध करने वाली उल्लेखनीय कृति के रूप में प्रतिष्ठित होता है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें