बढ़ती उम्र-
सिर्फ वर्षों का जुड़ना नहीं,
कभी-कभी यह
धीरे-धीरे
खुद से ही बिछड़ने की प्रक्रिया
होती है।
जहाँ कभी हँसी
बेवजह खिल उठती थी,
अब वही मुस्कान
कारण खोजती रह जाती है-
और अक्सर
खाली हाथ लौट आती है।
आप चुनने लगते हैं-
एक बंद दरवाजा,
चार दीवारों की सीमाएं,
मोबाइल की ठंडी रोशनी,
और एक ऐसी खामोशी,
जो अब शोर से भी अधिक सुकून
देती है।
जो शामें कभी
दोस्तों के साथ रंगीन हुआ
करती थीं,
अब वे चुपचाप
दीवारों से टकराकर
अपने ही भीतर लौट आती हैं।
बातें कम नहीं हुईं-
बस शब्दों ने
होठों तक आना छोड़ दिया है;
दिल चाहता तो है
कि कोई पूछे- ‘कैसे हो?’
पर जवाब देने का साहस
कहीं थक कर बैठ गया है।
रिश्ते अब भी हैं-
नामों की सूची में,
संपर्कों की भीड़ में,
पर उनकी गर्माहट
कहीं रास्ता भटक गई है।
हर ‘ऑनलाइन’ चेहरा
एक चमकती स्क्रीन के पीछे
अपना अकेलापन छुपाए बैठा है-
जैसे भीड़ में भी
कोई भीतर से बिल्कुल खाली
हो।
यह शायद उम्र नहीं-
बल्कि टूटते विश्वासों की
थकान है,
रिश्तों की धीमी दरारें हैं,
और खुद से बढ़ती हुई
एक अनजानी दूरी है।
हम बाहर से
समय के साथ बढ़ते हैं,
पर भीतर-
कहीं कुछ ठहर जाता है,
और वही ठहराव
खामोशी बनकर
हमारे साथ चलने लगता है।
शायद जरूरत है-
फिर से लौटने की,
उस अपने तक
जो कहीं भीतर
अब भी इंतजार कर रहा है-
ताकि उम्र
सिर्फ बढ़े नहीं,
जी भी सके।
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