रमेश पोखरियाल ‘निशंक’

असली आनंद

मैंने जैसे ही हाल में प्रवेश किया, वह भीड़ को चीरता मेरे कदमों में लम्बवत आ गिरा। उसके इस अप्रत्याशित व्यवहार से मैं अचानक हड़बड़ा उठा और उतनी ही तेजी से दो कदम पीछे हट गया। वह फिर आगे घिरकर मेरे नजदीक पहुँच गया और मेरे दोनों पैर पकड़ लिए। 
‘‘मैं भटक गया था सर, मेरा जीवन बचा लो।’ वह बड़बड़ाता हुआ मिन्नत कर रहा था। 
मुझे उसके इस व्यवहार पर बहुत गुस्सा आया- ‘कौन हो तुम, खड़े उठो।’ मैंने कड़क कर कहा। 
मेरा इतना कहना था कि भीड़ में शामिल कई लोगों ने उसे एक साथ उठा लिया और मेरे सामने खड़ा कर लिया। अब वह गर्दन झुकाये हुये दीन-हीन की तरह हाथ जोड़े मेरे सामने सुबक रहा था। न जाने क्यों मुझे उसका चेहरा जाना पहचाना सा लगा, दिमाग पर जोर दिया, किन्तु तब भी कुछ याद नहीं आया। खण्ड विकास अधिकारी के रूप मे मैं दो वर्ष पहले भी कार्य कर चुका था। प्रशासनिक सेवा में चयन होने पर इस जिले में पहली बार विकास अधिकारी के रूप में छह साल बाद मेरी नियुक्ति यहाँ हुई थी। अभी दो दिन पहले ही मैंने यहाँ पर ज्वाइन किया था, लेकिन ऑफिस आज पहली बार आया था। इन दो दिनों में मैंने अपने आवास कार्यालय में ही बैठकर जनपद से सम्बन्धित इतिहास, भूगोल, क्षेत्रीय समस्याओं और विकास कार्यों से सम्बन्धित अनेक जानकारियाँ जुटाई थी। 
आज पहले दिन ही नगर के प्रबुद्धजनों और आम जनता से मुलाकात की दृष्टि से विकास भवन के इस बड़े से ऑडिटोरियम में मिलन कार्यक्रम रखा गया था। ऑडिटोरियम के दोनों ओर जनपद के सभी प्रमुख अधिकारियों के लिये कुर्सीयाँ लगी थी, जबकि प्रतिनिधियों, प्रबुद्धजनों और आम जनमानस के लिये हॉल के बीचों-बीच कुर्सियों का इन्तजाम था, जिस पर कि मेरे आने से पूर्व ही काफी लोग डटे हुये थे। भीड़ इतनी अधिक थी कि लोग गैलरी से लेकर प्रवेश द्वार तक खड़े हो रखे थे। मेरे वहाँ प्रवेश करते ही अधिकारीगण अपनी-अपनी कुर्सियों से उठ गये, किन्तु इस व्यक्ति द्वारा अकस्मात मेरे पैरों में गिर पड़ने से वहाँ हड़बड़ी जैसे माहौल हो गया था। 
‘‘अरे इस आदमी को बाहर ले जाओ, साहब से बदतमीजी कर रहा है।’’ मेरे कड़क रुख के चलते कुछ लोगों ने बाहर से सुरक्षा गार्ड को बुला लिया। एक नहीं चार-चार सुरक्षा गार्ड जिन्न की तरह तुरन्त प्रकट हो गये, चारों ने उसे इस तरह जकड़ लिया मानों कोई आतंकवादी हाथ में आ गया हो। 
‘‘नहीं छोड़ दो इसे।’’ मैंने स्थिति को संभालने के दृष्टिकोण से कुछ शान्त होकर कहा, सुरक्षा गार्ड एकदम से मशीनी रोबोटो की तरफ एक-एक कदम पीछे हट गये। 
‘‘कौन हो तुम और इस तरह की हरकत क्यों की तुमने।’’ मैंने पूछा, अब वह मेरे सामने खड़ा था। 
‘‘सर मैं विनय, नहीं पहचाना सर ? मैं विनय हूँ, आपका विकास खण्ड कार्यालय वाला सहकर्मी।’’ वह एक श्वांस में बोल गया। 
‘‘विनय?’’ दिमाग पर कुछ जोर डालकर सोचा तो सब कुछ याद आता चला गया। 
‘‘यार राहुल क्या रस है तुम्हारे जीवन मंे ? न घूमना न फिरना, न मौज न मस्ती, न शराब न बीडी न सिगरेट।’’ मेरी सामने वाली टेविल पर साथियों के साथ शराब के जाम छलकाता विनय ने मुझसे कहा। 
‘‘नही यार, जो कुछ तुम कह रहे हो उसमें मुझे जरा भी दिलचस्पी नहीं।’’ मैंने संयमित भाव से जवाब दिया। 
‘‘अरे काम तो जिंदगीभर करना है, किन्तु इसके अतिरिक्त भी तो कुछ और होता है जीवन में उसका आनन्द कब उठाओगे।’’ उसने फिर बात को आगे बढ़ाया। 
‘‘इस सबमें क्या आनन्द है विनय, यह मेरी समझ से परे है। मुझे तो अपने काम में ही आनन्द आता है।’’ मैंने उसके तर्क को काटते हुये चाय समाप्त की और वहाँ से उठने का उपक्रम किया। 
‘अरे ये तो ऐसे ही मर जायेगा बेचारा, बिना जीवन का आनन्द लिए।’’ विनय ने फिर से खिल्ली उड़ाने वाले अंदाज में हँसकर कहा तो चारों दोस्त फिर ठहाका लगाकर हँसने लगे। 
मुझे बुरा नहीं लगा, बल्कि उनके ठहाकों के जवाब में मैंने मुस्कुराकर हाथ जोड़े और बाहर निकल आया। ‘‘आप लोग ले लो मेरे बदले का आनन्द भी।’’ 
ऐसा मेरे साथ पहली बार नहीं हुआ था, अपितु अक्सर होता रहता था। पहाड़ के इस दूरस्थ विकासखण्ड में खण्ड विकास अधिकारी के रूप में मेरी नियुक्ति हुई थी। पहाड़ का एक छोटा सा कस्बानुमा स्थान था यह, जहाँ पर ब्लॉक कार्यालय की बड़ी सी बिल्डिंग थी। 
कस्बे की छोटी बाजार के अन्दर ही पोस्ट ऑफिस, स्टेट बैंक, सहकारी बैंक और खाद-बीज का कार्यालय सहित इण्टर कॉलेज का भव्य भवन और एक अस्पताल भी था। सब्जी, राशन, फल मिठाई, चाय पानी आदि की दो दर्जन से अधिक दुकानों के साथ ही एक टूरिस्ट रेस्ट हाउस भी यहाँ पर था। 
एक प्रकार से यह इस क्षेत्र के दस किमी के अन्दर के निकटवर्ती गाँवों की एक मण्डी की तरह था। तीन तरफ से सड़कें यहाँ आकर मिलती थी। तीनों तरफ से अलग-अलग समय पर बसें नियत समयानुसार आती-जाती थी। सुबह की पहली बसें पहुँचने के साथ ही बाजार में लोगों की भीड़ हो जाती, लोग गाँवों से बैंक, पोस्ट ऑफिस, हॉस्पिटल आदि के कामों से आते, जरूरत की चींजे खरीदकर आखिर की पाँच बजे वाली बसों से लौटक जाते, तो स्थानीय दुकानदार भी अपनी दुकानें बन्द कर घरों को लौट जाते, पिफर तो यहाँ सन्नाटा-सा पसर जाता, सरकारी विभागों में काम करने वाले दूर के कर्मचारी ही यहाँ पर बचते। इस नाते सभी से अच्छा परिचय हो गया था। साम के समय चलते-फिरते या घूमते हुये सबसे मुलाकात हो ही जाती थी। 
विनय भी मेरे साथ विकास खण्ड कार्यालय में इन्जीनियर था। हम दोनों की उम्र और ओहदा लगभग एक समान होने और इस छोटी जगह में सीमित बाहरी कर्मचारी होने के कारण हम एक-दूसरे के अच्छे मित्र भी बन गये थे। 
सांय पाँच बजे कार्यालय बन्द होने के बाद मैं बाजार में शरतू लाला की चाय की दुकान पर पहुँच जाता और एक गिलास चाय जरूर पीता। काला-कलूटा शरत लाला लाल मिट्टी से पुती भट्टी के ऊपर बने ठीये पर विराजमान रहता, उसकी भट्टी में बांज और बुरांश के मोटे-मोटे गेले चौबीसों घण्टे सुलगते रहते, चूल्हे में एक बड़ा सा केतला और पीछे एक कढ़ाई हर समय सजी रहती। वहीं पर रोज विनय से मुलाकात हो जाती, वह लगभग रोज ही दोस्तों के साथ जाम टकराता मिलता। 
शरतू लाल दुकान के अन्दर शराब पीने वालों को कभी रोकता-टोकता नहीं, वरन् उनको ज्यादा प्रोत्साहन देता, इस बहाने उसके पकोड़े और उबले हुये अन्डे भी बिक जाते। इसके साथ ही कभी-कभार वह स्टील का एक बड़ा सा गिलास दुकान में काम करने वाले लड़के को पकड़ा देता। 
‘‘ऐ छोकरे ये गिलास रख दे सामने साहब के सामने।’’ 
और पीने वाले लोग एक बड़ा सा पैग बनाकर स्टील का गिलास वापस उस छोकरे को पकड़ा देते। आम के आम गुठलियों के दाम वाली बात को चरितार्थ करने वाला शरतू लाल कभी किसी से फालतू नहीं बोलता, बस अपने काम में लगा रहता है। उसके दांयी तरफ बाबा आदम के जमाने का लगने वाला एक रेडियो चौबीसों घण्टे बजता रहता। रेडियो में कौन सा स्टेशन बज रहा है और क्या बज रहा उससे शरतू लाल को कोई मतलब नहीं रहता। उसे तो सिर्फ इस बात से मतलब रहता कि रेडियो बज रहा है। मैं इस सब दृश्य का खूब आनन्द लेता, क्योंकि इसके अलावा यहाँ पर मनोरंजन करने का अन्य कोई भी साधन नहीं होता। 
इस जगह पर मेरी युवावस्था के दो महत्वपूर्ण वर्ष गुजरे, इन्हीं दो वर्षों मे मैंने प्रशासनिक सेवा परीक्षा की पूरी तैयारी की। परीक्षा में सफल होने पर मुझे पहली नियुक्ति जिला गोंडा में मिली जहाँ मैंने छह साल तक काम किया और अब पहाड़ के इस जनपद में मैं पुनः स्थानान्तरित होकर आया था। 
‘‘तुम्हारी ये हालत कैसे हो गई विनय ?’’ मैंने स्वभाव में कुछ नर्मी लाते हुए कहा तो उसने गर्दन उठा ली। 
‘‘बस साहब आप तो सब जानते ही हैं, उसी संगत में बर्वाद हो गया मैं।’’ उसकी आँखों से आँसू निकल आये।
‘‘ओह।’’ मैंने दुःख व्यक्त किया। 
‘‘चलो शाम को तुम मेरे आवास पर आओ, वहीं पर बातें करेंगे।’’ मेरा ऐसा कहना था कि विनय सेकेंड भर में वी.आई.पी. बन गया हो जैसे। सब लोग उसे ऐसे देखने लगे, मानों वह मेरा सबसे नजदीकी रहा हो और अब उसके द्वारा ही उनके काम भी सम्पन्न हो जायेंगे। 

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‘‘सर! कोई विनय नाम का गाँव का आदमी आपसे मिलने आया है। अपने आप को आपका पुराना दोस्त बताता है।’’ शाम को एक चपरासी मेरे पास आकर बोला। मैंने उसे आदर के साथ अन्दर बुला लिया। 
इस बार मुझे उसके चेहरे में एक रौनक दिखी। कपड़े भी कुछ ठीक-ठाक पहने थे उसने। 
‘‘क्या कर रहे हो आजकल।’’ मैंने ही बात की शुरूआत की। 
‘‘क्या करना है साहब, नौकरी नहीं रही, पत्नी भी घर छोड़कर चली गई। बस अब गाँव में ही हूँ, दिहाड़ी मजदूरी करके पेट पाल रहा हूँ।’’ उसने अपनी दास्तान बताई। 
‘‘लेकिन यह सब हुआ कैसे ?’’ मुझे उसके मुँह से अपने लिये साहब सुनना अच्छा नहीं लगा कुट अटपटा सा, क्योंकि वह मुझे सीधे नाम से ही पुकारता था। 
‘‘आपको तो सब मालूम है। इन्जीनियरिंग के क्षेत्र में ठेकेदारों से रोज ही पाला पड़ता था। बस उनके झांसे में आकर शराब-मुर्गा की बुरी आदत लगा बैठा, उसी को असली जिन्दगी समझ बैठा, फिर धीरे-धीरे निर्माण कार्यों में शिकायतें आने लगी। ठेकेदार उपहार में शराब-मुर्गा ले आते और बदले में एम.बी. में हस्ताक्षर करवा लेते, फिर एक दिन शिकायत जिले तक चली गई। विकास अधिकारी ने जाँच बैठा दी। जाँच में बीस लाख रुपये की गड़बड़ मिली।’’ वह धाराप्रवाह बोले जा रहा था, वह थूक निगलने के लिये कुछ देर रुका मुझे उसकी कहानी से दुःख पहुँच रहा था। 
‘‘फिर’’- मैंने आगे की कहानी सुनने के लिये पूछा। 
‘‘फिर क्या ? मैंने पैसे कहाँ से जमा करता। सबकुछ तो खाने-पीने में गंवा दिया। विकास अधिकारी ने मुझे बर्खास्त कर दिया, पुलिस ने जेल भिजवा दिया। छः महीने बाद जेल से छूटकर आया तो पत्नी भी घर छोड़कर चली गई थी। फिर मैं कहीं का न रहा।’’ उसने कहानी समाप्त की। 
‘‘तो अब मुझसे क्या चाहते हो?’’ मैंने जिज्ञासावश पूछा। 
‘‘कोर्ट में केस चल रहा है। मुझे विकास अधिकारी ने बर्खास्त किया था। कोर्ट कहती है कि यदि विकास अधिकारी चाहें तो मानवीय दृष्टिकोण से सरकार फिर बहाल कर सकती है।’’ उसने अपना असली मन्तव्य बतलाया। 
‘‘मतलब तुम मुझसे संस्तुति चाहते हो।’’ मैंने पूछा। 
‘‘जी।’’ उसने हाथ जोड़ दिये। अब मैं सुधर गया हूँ। जीवन का असली आनन्द अब मेरी समझ में आ गया है।’’ उसके स्वर में मैंने कम्पन्न महसूस की। 
मैं उस विनय और इस विनय में भेद कर पाने में असमर्थ था। समझ नहीं पा रहा था कि उसे क्या कहकर वापस भेजूँ।     

-37/1 विजय कॉलोनी, रवींद्रनाथ टैगोर मार्ग, देहरादून, उत्तराखंड

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